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अपनी पहचान और अस्तित्व के साथ रहने में कुछ भी गलत नहीं – किरेन रिजिजू

अपनी पहचान और अस्तित्व के साथ रहने में कुछ भी गलत नहीं – किरेन रिजिजूरांची, 30 अप्रैल नई दिल्ली, केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि भारत की युवा पीढ़ी तक सही जानकारी पहुंचे, इसलिए इतिहास में सुधार महत्वपूर्ण है। जब हम सही बातें कहना चाहते हैं और भारतीय इतिहास में सच्चाई का उल्लेख करने की कोशिश करते हैं तो कुछ लोग आहत होते हैं। वे कहते हैं कि आप इतिहास को फिर से लिख रहे हैं। जबकि सवाल इतिहास को फिर से लिखने का नहीं, बल्कि इतिहास को सुधारने का है। सवाल उन लोगों की जगह और स्थिति के बारे में है जो योग्य हैं। यह बहस कि इतिहास को फिर से लिखा जा रहा है, व्यर्थ है। सवाल यह है कि हमें सच्चा और वास्तविक इतिहास सीखना चाहिए। हम जानते हैं कि हम क्या पढ़ते हैं और हम जो देखते हैं उसे समझते हैं।

केंद्रीय मंत्री दिल्ली विश्वविद्यालय के उत्तर-पूर्वी छात्रों और यूथ यूनाइटेड फॉर विजन एंड एक्शन (YUVA) के छात्र समूह द्वारा आयोजित कार्यक्रम ‘अनसंग फ्रीडम फाइटर्स ऑफ नॉर्थ ईस्ट इंडिया’ को संबोधित कर रहे थे।

केंद्रीय मंत्री रिजिजू ने पाठ्यक्रम में परिवर्तनों पर हाल के विवाद के बारे में उल्लेख नहीं किया। उन्होंने कहा कि मैं प्राचीन या मध्यकालीन इतिहास के बारे में नहीं, लेकिन आधुनिक इतिहास के बारे में बात करता हूं। आधुनिक भारत और विशेष रूप से स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास हमें केवल सीमित ज्ञान देता है। हमारे इतिहास के छात्र किसी और का इतिहास सीख रहे हैं। यह कैसे संभव है कि हमारे छात्र उत्तर-पूर्वी राज्यों के बारे में नहीं जानते हैं, लेकिन वे यूरोप और लंदन के बारे में सब कुछ जानते हैं। वे उस पर गर्व महसूस करते हैं। जब वे शेक्सपियर और लिंकन के बारे में पढ़ते हैं तो उन्हें गर्व महसूस होता है। लेकिन कालिदास के बारे में नहीं ! यहीं पर उन्होंने युवा पीढ़ी की मानसिकता को बरगलाया है।

उन्होंने सीखने और अनुकूलन की आवश्यकता पर जोर दिया, जो स्वदेशी है। उन्होंने युवाओं से स्वदेशी उत्पादों और भारतीय भाषाओं का उपयोग करके भारतीय स्थानों पर जाने में गर्व महसूस करने का भी अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि मैंने यह कई सालों से देखा है कि जब हम अपनी स्वदेशी चीजों की बात करते हैं तो हम पिछड़े बन जाते हैं। कुछ अधिवक्ताओं को बहुत अधिक भुगतान किया जाता है, लेकिन कुछ ऐसे अधिवक्ता हैं जो योग्य होते हैं, उनके पास अच्छा ज्ञान होता है लेकिन उन्हें बड़े मामले नहीं मिलते, क्योंकि वे अंग्रेजी नहीं बोलते हैं। अन्य भारतीय भाषाओं में अच्छा बोलने वालों का भी सम्मान क्यों नहीं किया जाता ?

उन्होंने कहा कि अपनी पहचान और अस्तित्व के साथ रहने में कुछ भी गलत नहीं है। लेकिन हमारे यहां उसका सम्मान कम है। यह धारणा हमारे द्वारा पढ़ी गई पुस्तकों के कारण आई है। इसलिए उनमें बदलाव लाने की आवश्यकता है। जो हमें दिया गया है, अगर हम उसे पढ़ते रहेंगे तो यह हमारे साथ न्याय नहीं होगा।

उत्तर-पूर्वी राज्यों के गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि देने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय में कार्यक्रम स्वाधीनता का अमृत महोत्सव के हिस्से के रूप में आयोजित किया गया है।

इसके अलावा नागालैंड का प्रतिनिधित्व करने वाली पहली महिला राज्यसभा सांसद मैडम एस. फांगनोन कोन्याक, डीयू दिन आफ स्टूडेंट्स प्रोफेसर बलराम पाणि और डॉ. फिरमी बोडो, सहायक प्रोफेसर जेएनयू ने भी संबोधित किया।

रानी गैदिन्लिउ, कनकलता बरुआ, शंबोदन फोंगलो, रोपुइलियानी, मतमूर जामोह, महाराजा कुलचंद्र, बलिदानी जादोनांग और यू तिरोत सिंह आदि जैसे गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों की जीवन कहानियों को वक्ताओं ने विशेष याद किया. पूर्वोत्तर भारत में आईएनए का नेतृत्व करने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा निभाई भूमिका हमेशा सराहनीय रहेगी।


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