भोजशाला – सत्य सनातन की ऐतिहासिक विजय…16 मई 2026 : - मृत्युंजय दीक्षित

धार में स्थित राजा भोज द्वारा निर्मित भोजशाला मंदिर के विवाद का निर्णय हिन्दुओं पक्ष में आया है। भोजशाला को लेकर हिन्दू समाज सैकड़ों वर्षों से संघर्ष कर रहा था। उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ के दो न्यायाधीशों की बेंच ने निर्णय में परिसर को हिन्दू मंदिर घोषित किया है। न्यायालय ने एएसआई के वैज्ञानिक सर्वेक्षण के आधार पर यह निर्णय दिया और सरकार को ऐतिहासिक संरचनाओं  के संरक्षण की जिम्मेदारी दी है। निर्णय में न्यायालय ने कहा कि भोजशाला का मूल स्वरूप संस्कृत शिक्षा केंद्र का था। पुरातत्व एक विज्ञान है और न्यायालय वैज्ञानिक निष्कर्षों पर भरोसा करता है। न्यायालय ने कहा कि सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वह ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व वाली संरचनाओं का संरक्षण करे। श्रद्धालुओं के लिए बुनियादी सुविधाएं, कानून व्यवस्था और संरक्षण सुनिश्चित करना सरकार का दायित्व है। यह निर्णय 24 दिन और 43 घंटे की व्यापक सुनवाई के बाद न्यायाधीश विजय कुमार शुक्ला और आलोक अवस्थी की बेंच ने सुनाया है।

उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि विवादित स्थल पर हिन्दू पूजा की निरंतरता कभी समाप्त नहीं हुई और ऐतिहासिक दस्तावेजों और साहित्य से यह स्थापित होता है कि विवादित क्षेत्र का मूल चरित्र भोजशाला के रूप में था जो परमार वंश के राजा भोज से जुड़ा संस्कृत शिक्षा केंद्र था। विवादित भोजशाला कमाल मौला मस्जिद परिसर एक संरक्षित स्मारक है, जिसे 18 मार्च 1904 से संरक्षित स्मारक का दर्जा प्राप्त है।

परिसर में केवल हिन्दू ही पूजा पाठ कर सकेंगे क्योंकि वर्ष 2003 वाला वह आदेश रद्द हो गया है, जिसमें हिन्दुओं को केवल मंगलवार और मुस्लिमों को शुक्रवार को नमाज अदा करने की छूट दी गई थी। न्यायालय के इस निर्णय के बाद अब लंदन म्यूजियम से माँ वाग्देवी की प्रतिमा वापस लाने का मार्ग भी प्रशस्त हो गया है।

वर्ष 1034 में परमार शासक राजा भोज ने ज्ञान की साधना और माँ सरस्वती की आराधना के लिए भोजशाला का निर्माण कराया था। यह नालंदा, तक्षशिला और काशी की ही तरह एक विशाल आवासीय संस्कृत विश्वविद्यालय था। सैकड़ों अलंकृत लाल स्तंभों पर देवी-देवताओं की मूर्तियां शोभायमान थीं। भवन में माघ, बाणभट्ट, कालिदास, भवभूति, भास्कर भट्ट, धनपाल, मातुंगाचार्य जैसे प्रकांड विद्वान अध्ययन व अध्यापन करते थे। भवन के मध्य में विशाल यज्ञकुंड है। वर्ष 1035 में यहाँ माँ सरस्वती की अप्रतिम सौंदर्य से पूर्ण प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा बसंत पंचमी के दिन की गई थी।

राजा भोज शौर्य एवं पराक्रम के साथ साथ धर्म ज्ञान, विज्ञान, साहित्य तथा कला के ज्ञाता थे। राजा भोज ने माँ सरस्वती की आराधना, हिन्दू जीवन दर्शन एवं संस्कृत के प्रसार हेतु भोजशाला का निर्माण कराया था।

पराभव काल – पावन भोजशाला जो अपने आंगन में धर्म, दर्शन और शास़्त्रार्थ के लिए प्रसिद्ध थी, जहां वेदमंत्रों की ध्वनि गूंजती थी, वहीं इस्लामी साजिश के तहत माँ सरस्वती की आराधना का ढोंग करते हुए कमाल मौलाना ने अपने कदम बढ़ाए। कमाल मौलाना ने तंत्र- मंत्र के माध्यम से 36 वर्षों तक संपूर्ण मालवा राज्य को धर्मान्तरित करवाया और मालवा राज्य की जानकरियां भी एकत्र करता रहा। ईस्वी वर्ष 1305 में इस्लामी हमलावर अलाउद्दीन खिलजी ने परमारों के अभेद्य गढ़ मालवा पर आक्रमण कर इस्लामी साम्राज्य की स्थापना की तथा भोजशाला सहित हिन्दुओं के मंदिरों व आस्था के केंद्रों का विध्वंस किया। वर्ष 1401 में दिलावर खां गौरी ने मालवा को अपना साम्राज्य घोषित कर विजय मंदिर (सूर्य मार्तंड मंदिर) को ध्वस्त किया। आज उसी विजय मंदिर में नमाज पढ़ी जा रही है और उसे भी लाट मस्जिद कहते हुए मस्जिद सिद्ध करने की साजिशें जारी हैं।

वर्ष 1514 में महमूद शाह खिलजी द्वितीय ने आक्रमण कर भोजशाला को खंडित कर मस्जिद में परिवर्तित करने का प्रयास किया और मंदिर के बाहर अतिक्रमण करके कमाल मौलाना की मृत्यु के 204 वर्ष बाद मकबरा बनाया। इसके आधार पर ही माँ सरस्वती के मंदिर भोजशाला को कमाल मौला की मस्जिद बनाने का षड्यंत्र किया जा रहा था, जिसे उच्च न्यायालय की इंदौर बेंच ने साक्ष्यों के साथ ध्वस्त किया है ।

साठ के दशक में स्थानीय लोगों ने श्री महाराजा भोज स्मृति बसंतोत्सव समिति का गठन किया और प्रयत्न प्रारंभ कर दिए। हिन्दू समाज माँ सरस्वती की भोजशाला को हासिल करने के लिए सतत संघर्षवान तथा संकल्पवान रहा।

वर्ष 1995 में भोजशाला में दो पक्षों के मध्य विवाद के बाद प्रशासन ने हिन्दुओं को मंगलवार को पूजा और मुस्लिमों को शुक्रवार को नमाज की अनुमति दी। 12 मई, 1997 को तत्कालीन मुख्यमंत्री  दिग्विजय सिंह ने मुस्लिम तुष्टिकरण का परम उदाहरण देते हुए भोजशाला में आम लोगों के प्रवेश पर पूरी तरह से रोक लगा दी और हिन्दुओं की मंगलवार की पूजा भी रोक दी। बाद में हिन्दुओं को वर्ष में केवल एक दिन बसंत पंचमी और मुस्लिम समाज को प्रत्येक शुक्रवार को नमाज अदा करने की अनुमति दी गई। वर्ष 2003 में हिन्दुओं को बिना फूल माला के पूजा करने की अनुमति दी गई और भोजशाला को पर्यटकों के लिए भी खोला दिया गया। वर्ष 2013 में बसंत पंचमी के अवसर पर तथा फिर वर्ष 2016 में सांप्रदायिक तनाव हुआ। तब से लेकर आज तक अनेकानेक जनजागरण अभियान और  न्यायिक संघर्ष चलता रहा।