देश में जनगणना का कार्य शुरू होते ही एक बार फिर अलग रिलिजन कोड की मांग को लेकर कुछ संगठन सक्रिय हो गए हैं। पश्चिम बंगाल, झारखंड और मध्य प्रदेश में आयोजित बैठकों और सम्मेलनों में जनजातीय समुदाय के लिए अलग रिलिजन कोड की मांग उठाई गई है। साथ ही समान नागरिक संहिता (UCC) का विरोध तेज करने का प्रयास किया जा रहा है।
तो क्या यह मांग वास्तव में जनजातीय समाज के हित में है, या फिर यह पहचान की राजनीति के माध्यम से समाज को नई रेखाओं में विभाजित करने का प्रयास है?
15 जून 2026 को छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश) में राष्ट्रीय क्रांति मोर्चा द्वारा आयोजित बैठक में UCC का विरोध किया गया। वक्ताओं ने दावा किया कि UCC लागू होने से परंपरागत अधिकार और पेसा कानून कमजोर होंगे तथा भूमि माफियाओं को लाभ मिलेगा। दूसरी ओर, 14 जून को पश्चिम बर्धमान जिले (पश्चिम बंगाल) के बर्नपुर में आयोजित “सर्व आदिवासी महासम्मेलन” में अलग “ट्राइबल रिलिजन कोड” की मांग को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया। झारखंड के रामगढ़ में आयोजित आदिवासी कुड़मी समाज की बैठक में भी जनगणना में “सरना” को रिलिजन कॉलम में शामिल करने का प्रस्ताव पारित किया गया।
अब बड़ा प्रश्न यह कि क्या अलग रिलिजन कोड की मांग वास्तव में सामाजिक न्याय का मुद्दा है, या यह देश की सांस्कृतिक एकता को कमजोर करने वाला एक राजनीतिक एजेंडा बनता जा रहा है?
जनजातीय परंपराएं भारतीय सभ्यता का महत्वपूर्ण अंग
भारत की जनजातीय परंपराएं हजारों वर्षों से भारतीय सभ्यता का एक महत्वपूर्ण अंग रही हैं। पुरखों का सम्मान, कुलदेवता, ग्राम देवता और स्थानीय देवताओं की पूजा तथा विशिष्ट पर्व-त्योहार भारतीय सभ्यता के व्यापक सांस्कृतिक ढांचे से अलग नहीं हैं।
ऐसे में अलग रिलिजन कोड की मांग यह संदेश देती है कि जनजातीय समुदाय भारत की मुख्य सांस्कृतिक धारा से अलग है। यह दृष्टिकोण ऐतिहासिक तथ्यों से मेल नहीं खाता, बल्कि समाज में विभाजन को बढ़ावा देता है।
पिछले कुछ दशकों में विभिन्न राज्यों में अलग रिलिजियस पहचान के नाम पर आंदोलनों को बढ़ावा मिलता रहा है। कई मामलों में यह देखा गया है कि सामाजिक और आर्थिक समस्याओं के समाधान की बजाय पहचान आधारित राजनीति को प्राथमिकता दी गई।
आज भी जनजातीय क्षेत्रों की प्रमुख चुनौतियां शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं के विस्तार से जुड़ी हैं। इन मुद्दों के बजाय पूरा राजनीतिक विमर्श रिलिजन कोड और पहचान के प्रश्न तक सीमित कर दिया जाए, तो इसका नुकसान अंततः उन्हीं समुदायों को होगा जिनके नाम पर आंदोलन चलाए जा रहे हैं।
झारखंड में सरना को अलग रिलिजन कॉलम में शामिल करने की मांग लंबे समय से उठाई जाती रही है। तर्क दिया गया कि इससे जनजातीय परंपराओं को अलग पहचान मिलेगी। लेकिन देखा जाए तो इससे समाज में नई धार्मिक रेखाएं खिंच सकती हैं और जनजातीय समुदायों के भीतर भी विभाजन बढ़ सकता है।
भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में हर समुदाय की सांस्कृतिक विशेषताओं का सम्मान है, लेकिन यह सम्मान राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता की कीमत पर नहीं होना चाहिए। यदि प्रत्येक समूह अलग रिलिजन कोड की मांग करने लगे, तो भविष्य में समाज अनेक छोटे-छोटे वर्गों में विभाजित हो सकता है।
सामाजिक एकता बनाम अलग पहचान
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी एकता है। देश के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग परंपराएं और सांस्कृतिक स्वरूप मौजूद होने के बावजूद भारत एक साझा राष्ट्रीय पहचान के सूत्र में बंधा हुआ है। अलग रिलिजन कोड की मांग भले ही सांस्कृतिक पहचान के नाम पर उठाई जा रही हो, लेकिन यह समाज में नई विभाजनकारी रेखाएं खींचने का माध्यम भी बनेगी।
जनजातीय समाज के अधिकारों, परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण निस्संदेह आवश्यक है। लेकिन इसका रास्ता अलग रिलिजन कोड या पहचान आधारित राजनीतिक आंदोलनों से होकर नहीं जाता। वास्तविक आवश्यकता शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, भूमि अधिकारों की सुरक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण की है।
देश को जोड़ने वाले मुद्दों पर संवाद होना चाहिए, न कि ऐसे प्रयासों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए जो समाज को पहचान के आधार पर विभाजित करें। अलग रिलिजन कोड की मांग जनजातीय समाज की वास्तविक समस्याओं का समाधान नहीं, बल्कि एक नया विभाजनकारी विमर्श खड़ा करती है।