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हल्दीघाटी युद्ध में किसकी विजय हुई थी?

हल्दीघाटी युद्ध में किसकी विजय हुई थी?हल्दीघाटी युद्ध, 18 जून 1576 को महाराणा प्रताप और अकबर की मुगल सेना के बीच लड़ा गया ऐतिहासिक युद्ध था, जो आज भी इतिहासकारों के बीच चर्चा का विषय है। यह युद्ध सिर्फ तलवारों की भिड़ंत नहीं था, बल्कि स्वाभिमान, रणनीति और आत्मबल का असाधारण प्रतीक था। पर, एक प्रश्न आज भी लोगों के मन में बना हुआ है, आखिर हल्दीघाटी युद्ध में किसकी जीत हुई थी?

ऐतिहासिक तथ्यों, स्रोत एवं प्रमाणों का विश्लेषण करने पर स्पष्ट होता है कि हल्दीघाटी युद्ध में निर्णायक विजय महाराणा प्रताप की हुई थी।

हल्दीघाटी युद्ध की पृष्ठभूमि

हल्दीघाटी युद्ध ऐसे समय लड़ा गया, जब महाराणा प्रताप ने नई-नई मेवाड़ की गद्दी संभाली थी। अकबर भी अपने राज्य विस्तार तथा महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए विभिन्न राज्यों के खिलाफ कूट रचनाएं कर रहा था। अकबर अपनी जिहादी साम्राज्यवादी नीति एवं व्यापारिक मार्गों की सुगमता के लिए सभी राजपूत राजाओं को अपने अधीन कर रहा था। परंतु, मेवाड़ उसके लिए सबसे बड़ी बाधा थी। महाराणा प्रताप के शासन में आने के पूर्व से ही उनके पिता महाराणा उदय सिंह भी अकबर के आगे नहीं झुके थे।

1572 ईस्वी में महाराणा प्रताप के मेवाड़ का राज्य संभालने के उपरांत अकबर ने चार बार अपने दूतों को संधि संदेश लेकर भेजा।

  1. अगस्त 1572 ईस्वी में जलाल खान
  2. अप्रैल 1573 ईस्वी में कुंवर मानसिंह
  3. सितंबर 1573 ईस्वी में आमेर के राजा भगवंतदास
  4. दिसंबर 1573 ईस्वी में टोडरमल खत्री

संधि की शर्तों में अकबर के दरबार में हाजरी लगाना, मुगलों को कर देना एवं मेवाड़ की बहन-बेटियों के मुगलों के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित करने जैसी बातें सम्मिलित थीं। यह स्वाभिमानी प्रताप को स्वीकार्य नहीं था। इसलिए उन्होंने संधि की बजाय युद्ध चुना। हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर ने अपने सेनापति आमेर के कुंवर मानसिंह को महाराणा प्रताप को जिंदा या मुर्दा लेकर आने का आदेश दिया था।

हल्दीघाटी युद्ध का घटनाक्रम

18 जून 1576 के दिन युद्ध लगभग 5 घंटे और तीन चरण में चला –

प्रथम चरण प्रातः 8 बजे के बाद आरम्भ हुआ। प्रथम चरण में हल्दीघाटी के मुहाने से मेवाड़ की सेना आगे बढ़ कर आक्रमण करती है। इस समय हरावल के वाम पार्श्व (बायां भाग) से हकीम खां सूर अपने सैनिकों के साथ आगे बढ़ता है और मुगल सेना के दक्षिण पार्श्व पर टूट पड़ता है। इस पहले धक्के में मुगल सेना बिखर कर करीब 5 से 7 कोस दूर बनास के दूसरी ओर भाग खड़ी होती है। ऐसी परिस्थिति में दूसरे चरण का युद्ध हल्दी घाटी के मुहाने से करीब सवा कोस दूरी पर होता है। यहां पर मुगल सैनिकों के स्थान पर कछवाहों के राजपूत सैनिक मेवाड़ की सेना के सामने थे। इस दौरान मेवाड़ की सेना के दबाव से मुगलों की राजपूत टुकड़ी करीब पौन कोस पीछे हटती है और बनास के दक्षिणी किनारे तक भागती है। बिखरी हुई मुगल सेना मिहतर खां के नेतृत्व में अंतिम चरण का युद्ध लड़ती है। इस समय मेवाड़ की युद्ध नीति के अनुसार झाला मानसिंह ने प्रताप का रक्षाकवच व तलवार धारण कर ली और प्रताप घायल घोड़े चेतक के साथ युद्ध से निकल गए, ताकि पहाड़ों में से वार करने एवं गोगूँदा को सुरक्षित करने की नीति बनाई जा सके। झाला बीदा (मान सिंह) वीरगति को प्राप्त होते हैं। अंतिम चरण दोपहर बाद समाप्त हो जाता है। मुगल सेना युद्ध के दौरान तीनों चरण में पीछे हटती रही और न ही प्रताप का पीछा कर पाई।

अकबर का सैनिक एवं युद्ध का आँखों देखा वर्णन करने वाला इतिहासकार अलबदायूंनी अपनी पुस्तक मुन्तखाब उल तवारीख में प्रताप का पीछा न करने के तीन कारण बताता है –

  1. मुगलों को भय था कि प्रताप पहाड़ों में घात लगाए हुए है और उसके अचानक आक्रमण से अत्यधिक सैनिकों का जीवन खतरे में पड़ जाएगा।
  2. जून माह की झुलसाने वाली तेज धूप, 3. मुगल सेना की अत्यधिक थकान से युद्ध करने की क्षमता न रहना।

युद्ध का अंत मेवाड़ की युद्धनीति के अनुरुप हुआ। मेवाड़ की सेना के भीषण संघर्ष ने मुगल सेना में डर व्याप्त कर दिया।

“भयाक्रांत मुगल सेना को कई दिनों तक गोगूँदा में कैद डेरा डाल कर रहना पड़ा।

हल्दीघाटी के परिणाम मुगलों प्रतिकूल रहने पर अकबर ने नाराज होकर मान सिंह व आसफ खान दोनों की ड्योढ़ी कम कर दी।

महाराणा प्रताप ने अपनी विजय के उपलक्ष्य में ब्राह्मणों को भूमिदान दिया और अपनी संप्रभुता को सिद्ध किया। हल्दीघाटी के निकट बलीचा गांव का ताम्रपत्र इसका प्रमाण है।

इस युद्ध के बाद मुगल विरोधी शक्तियों को पुनः खड़ा होने का बल और प्रेरणा मिली। प्रताप अब स्वतंत्रता, स्वाभिमान और संघर्ष के प्रतीक बन गये।

युद्ध में किसी पक्ष के जीतने के संबंध में तीन बातें बहुत महत्वपूर्ण हैं –

युद्ध के माध्यम से बड़ी मात्रा में धन संपदा अथवा भूमि पर अधिकार हो जाए

युद्ध के पश्चात सामने वाले पक्ष के राजा की मृत्यु हो जाए अथवा वह अपना राज्य छोड़कर भाग जाए

पराजित राज्य विजेता राज्य की अधीनता स्वीकार करके कर (tax) देने लग जाए।

उपरोक्त तीनों ही आधारों पर कह सकते हैं कि युद्ध में महाराणा प्रताप की विजय हुई।”

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