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और भय को जीतकर जो आगे बढ़ती है, वह बनती है लक्ष्मीबाई

और भय को जीतकर जो आगे बढ़ती है, वह बनती है लक्ष्मीबाई

डॉ. शुचि चौहान

जब झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम लेते हैं, तो हमारी आँखों के सामने तलवार लहराती, घोड़े पर सवार, मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी की दहाड़ लगाती एक वीरांगना की छवि उभर आती है। लेकिन इस छवि के पीछे एक स्त्री का हृदय भी था, एक ऐसी स्त्री, जिसने जीवन के वे सारे दुःख सहे जो किसी भी महिला को भीतर तक तोड़ सकते हैं। जब हम लक्ष्मीबाई को केवल एक योद्धा के रूप में देखते हैं, तब हम उनके संघर्ष का आधा हिस्सा ही देख पाते हैं। उनके भीतर एक बेटी थी, एक पत्नी थी, एक माँ थी और इन सबके ऊपर एक ऐसी शासक थी, जिसे परिस्थितियों ने समय से पहले कठोर बना दिया था।

लक्ष्मीबाई का बचपन का नाम मणिकर्णिका था, लेकिन प्यार से सब उन्हें मनु कहते थे। मनु चंचल, निडर और जिज्ञासु बच्ची थी, उसे गुड़ियों से कम घोड़ों से अधिक लगाव था। तलवार उसके हाथ में खिलौने की तरह लगती थी। लेकिन शायद तब मनु को यह नहीं पता था कि एक दिन यही तलवार उसके जीवन की सबसे निकटतम सहेली बन जाएगी।

सन् 1842 में मनु का विवाह झांसी के राजा गंगाधर राव से हुआ और वे रानी बनकर झाँसी आ गईं, जहां उन्हें लक्ष्मीबाई नाम मिला। झाँसी उस समय बुंदेलखण्ड का एक महत्वपूर्ण राज्य था। विवाह के बाद उन्होंने राजकाज की बारीकियों को समझा और राज्य के प्रशासनिक कार्यों में रुचि ली।

किन्तु उनके जीवन में सुख अधिक समय तक टिक नहीं सका। उन्हें पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई, परंतु वह कुछ ही महीनों में चल बसा। पति गंगाधर राव ने एक बच्चे को गोद लिया, लेकिन पुत्र शोक से उबर नहीं पाए और अस्वस्थ रहने लगे। जल्दी ही उनकी भी मृत्यु हो गई। लक्ष्मीबाई के लिए यह दूसरा बड़ा आघात था।

एक युवा विधवा, एक छोटा दत्तक पुत्र और पूरे राज्य की जिम्मेदारी…। ऐसे समय में कोई भी बिखर सकता है। लेकिन लक्ष्मीबाई को वह अधिकार भी नहीं मिला; उनके हर निर्णय के साथ झाँसी का भविष्य जुड़ा था।

अंग्रेजों ने रानी को अबला समझा और लॉर्ड डलहौजी की नीति ने उनके दत्तक पुत्र को उत्तराधिकारी मानने से मना कर दिया। यह केवल राज्य छीनने का षड्यंत्र नहीं था, बल्कि एक माँ के अधिकार को भी चुनौती थी। उनके सामने झांसी की जनता थी, पुत्र का भविष्य था, पति की विरासत को बचाने की चुनौती थी। वे केवल राज्य बचाने के लिए संघर्ष नहीं कर रही थीं। वे अपने पुत्र के अधिकार के लिए लड़ रही थीं। अपने पति की विरासत के लिए लड़ रही थीं। झांसी के स्वाभिमान के लिए लड़ रही थीं और उन सब स्त्रियों के आत्मविश्वास के लिए भी लड़ रही थीं, जिनकी सम्पत्ति पर अंग्रेजों की नजर थी।

फिर आया 1857…

चारों ओर युद्ध की आहट थी। अंग्रेजी सेनाएँ आगे बढ़ रही थीं। झाँसी घिर रही थी। इसी समय लक्ष्मीबाई ने वह निर्णय लिया, जिसने उन्हें अमर बना दिया।

उन्होंने युद्ध चुना, यह एक कठिन निर्णय था।

जब हम चित्रों में देखते हैं कि लक्ष्मीबाई ने अपने पुत्र दामोदर राव को पीठ पर बाँध रखा है और हाथ में तलवार है, तो हम अक्सर उस दृश्य की वीरता पर मुग्ध हो जाते हैं। लेकिन उस चित्र के भीतर छिपी माँ की चिंता को शायद ही कोई अनुभव करता है।

घोड़ा दौड़ रहा है।

चारों ओर गोलियाँ चल रही हैं।

तलवारें चमक रही हैं।

मृत्यु हर क्षण सामने खड़ी है।

और उस समय एक छोटा बच्चा मां की पीठ से बँधा हुआ है।

कितनी बार उनके मन में यह भय आया होगा कि कहीं कोई गोली बच्चे को न लग जाए?

कितनी बार उन्होंने अपने शरीर को ढाल बनाया होगा ताकि पुत्र सुरक्षित रहे?

कितनी बार उन्हें लगा होगा कि यदि वे गिर गईं तो इस बच्चे का क्या होगा?

इतिहास वीरता देखता है।

लेकिन युद्ध क्षेत्र में बच्चा पीठ पर हो तो मां का हृदय भय भी अनुभव करता है।

और यह भय को जीतकर जो आगे बढ़ जाती है, वह लक्ष्मीबाई बनती है।

जब झाँसी का किला टूट रहा था, तब रानी के सामने आत्मसमर्पण का विकल्प भी था। वे अंग्रेजों से समझौता कर सकती थीं। अपना जीवन बचा सकती थीं। अपने पुत्र का भविष्य सुरक्षित करने का प्रयास कर सकती थीं। लेकिन उन्होंने वह रास्ता नहीं चुना।

उन्होंने संघर्ष चुना।

लक्ष्मीबाई चाहती थीं कि उनका पुत्र और पुत्रवत जनता यह जाने कि उन्होंने अन्याय के सामने सिर नहीं झुकाया।

जब वे झाँसी से निकलकर कालपी और फिर ग्वालियर पहुँचीं, तब तक वे केवल एक रानी नहीं रह गई थीं। वे अंग्रेजों से प्रतिशोध का प्रतीक बन चुकी थीं। लेकिन भीतर कहीं एक स्त्री भी थी, जिसने पति खोया था, पुत्र खोया था, घर खोया था और अब अपना राज्य भी खो चुकी थी।

उनके पास बचा था तो… एक तलवार, एक बच्चा और आत्मसम्मान।

इन्हीं तीन के साथ वे एक शक्तिशाली साम्राज्यवादी शक्ति से लड़ रही थीं।

ग्वालियर के अंतिम युद्ध में जब वे घायल हुईं और उन्हें अपने जीवन का अंत दिखाई दे रहा था, तब उन अंतिम क्षणों में उनके मन में क्या-क्या चल रहा था, कोई नहीं जानता। लेकिन एक माँ और शासिका की दृष्टि से सोचें तो शायद उन्हें अपने बच्चे का भविष्य चिंतित कर रहा होगा। उन्हें झाँसी की जनता की सुरक्षा बेचैन कर रही होगी। शायद उन्हें अपना खोया हुआ पहला पुत्र याद आया होगा। शायद उन्हें अपने पति का चेहरा याद आ रहा होगा।

लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

उनका शरीर गिर गया, परंतु साहस कम नहीं हुआ।

उनकी साँसें रुक गईं, लेकिन वीरता अमर हो गई।

आज हम उन्हें महान योद्धा के तौर पर तो याद करते ही हैं। लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि वे एक ऐसी स्त्री थीं, जिसने निजी दुःखों को अपने कर्तव्य के रास्ते में नहीं आने दिया। जिसने मातृत्व को कमजोरी नहीं, शक्ति बनाया। जिसने विधवा होने को पराजय नहीं बनने दिया। जिसने अपने आँसुओं को तलवार की धार में बदल दिया।

यही कारण है कि इतिहास में हजारों रानियाँ हुईं, लेकिन लक्ष्मीबाई केवल एक हुई।

राजमहल में रहकर रानी बनना आसान है, पर अपने बच्चे को पीठ पर बाँधकर मृत्यु से लड़ते हुए राज धर्म निभाना असाधारण है।

लक्ष्मीबाई बनने के लिए निजी सुख, सपने, आँसू और कभी-कभी पूरा जीवन भी बलिदान करना पड़ता है। यही कारण है कि डेढ़ सौ वर्ष बाद भी जब भारत वीरता का अर्थ खोजता है, तो उसे एक घोड़े पर सवार वह माँ दिखाई देती है, जिसके दांतों में घोड़े की लगाम और दोनों हाथों में तलवार थी, जिसकी पीठ पर उसका पुत्र बँधा हुआ था। वही दृश्य रानी लक्ष्मीबाई को इतिहास से उठाकर अमरत्व प्रदान करता है।

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