कल शुक्रवार 19 जून को, बांग्लादेश में एक अभूतपूर्व दृश्य देखने मिला। ढाका के नेशनल प्रेस क्लब के सामने, एक विशाल मानव श्रृंखला बनाई गई। फिर दोपहर तक ढाका के विभिन्न विश्वविद्यालयों के छात्र शाहाबाद क्षेत्र में एकत्र हुए। उनकी संख्या इतनी अधिक थी कि समूचा शाहाबाद परिसर ठप्प हो गया। तब तक शाम हो गई थी। इन विद्यार्थियों ने भव्य और प्रभावी मशाल जुलूस निकाला। इस जुलूस को देखकर, मानो महानगर ढाका ठिठक गया..!
ढाका के लिए ऐसे दृश्य आम बात हैं। फिर, 19 जून के इन प्रदर्शनों में ऐसी क्या विशेषता थी कि ढाका ही नहीं, तो सारा बांग्लादेश सहम गया..?
कारण, यह सारे छात्र हिन्दू थे। मानव श्रृंखला बनाने वाले सारे कार्यकर्ता हिन्दू थे। वह ‘हिन्दू महाजोत’ (Bangladesh National Hindu Grand Alliance) के अंतर्गत भगवान श्रीराम के अपमान के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे।
अंतर था, बहुत अधिक अंतर था। कल तक मार खाने वाला हिन्दू, आज आत्मविश्वास से लबालब होकर, अपने आराध्य की विडंबना का विरोध प्रकट कर रहा था। बांग्लादेश की सरकार को अल्टीमेटम दे रहा था।
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बांग्लादेश के मानचित्र की, यदि हम एक कुर्ता पहने हुए व्यक्ति के रूप में कल्पना करते हैं, तो उस व्यक्ति के गले के स्थान पर हैं, ‘गायबांधा’ जिला। इस गायबांधा जिले का पलाशबाड़ी गांव, इस समय समूचे बांग्लादेश में छाया हुआ है। इस पलाशबाड़ी में, हिन्दू समुदाय द्वारा भगवान श्रीराम की 81 फीट की मूर्ति का निर्माण किया जा रहा है। श्री श्री राधा गोविंद और काली मंदिर परिसर में निर्माणाधीन मूर्ति का 80 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है। राधा गोविंद मंदिर समिति के अध्यक्ष हरिदास चंद्रदास के नेतृत्व में यह कार्य चल रहा है। (गायबांधा के बारे में कहा जाता है कि यहां महाभारत काल में सम्राट विराट राज करते थे। उन्होंने सैकड़ों की संख्या में गायें पाल रखी थी। जहां पर यह शहर है, वहां पर गायें बांधी जाती थी। इसलिए इस स्थान को गायबांधा कहते हैं।)
विगत कुछ दिनों से इमाम-उलेमा परिषद तथा अन्य कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों के विरोध के कारण मूर्ति के निर्माण का कार्य पूरी तरह से रुका है। कट्टरपंथियों ने मूर्ति को ध्वस्त करने की धमकी दी है। इसी कड़ी में, इस सप्ताह कुछ उपद्रवी लोगों ने, निर्माणाधीन मूर्ति पर जूते – चप्पलों का ढेर लगा दिया। इसके विरोध में बांग्लादेश के हिन्दू आक्रामक हुए। ढाका के दक्षिणी हिस्से में स्थित, ‘जगन्नाथ विश्वविद्यालय’ के हिन्दू विद्यार्थी सर्वप्रथम धार्मिक अवमानना के विरोध में सड़कों पर उतर आए। इस आंदोलन से जो चिंगारी सुलगी, उससे बांग्लादेश के हिन्दू जागृत हुए। उसी कड़ी में कल ढाका में हिन्दू विद्यार्थियों का अभूतपूर्व प्रदर्शन हुआ।
बांग्लादेश में इस समय मात्र 9% से 10% हिन्दू बचा हुआ है। गायबांधा में तो मात्र 7% हिन्दू हैं। इससे पहले भी, हिन्दुओं का दमन होते आया है। बांग्लादेश में अनेकों बार हिन्दुओं के मंदिर तोड़े गए। आराध्य देवताओं के विग्रह ध्वस्त किए गए। कभी हिन्दुओं ने छुटपुट विरोध किया, तो अधिकतम समय, मन मसोस कर रह गए।
तो फिर इस बार बांग्लादेश के हिन्दुओं में यह साहस कहां से आया..?
इसका उत्तर है, पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम…!
जी, हां। पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम से निकली हिन्दुत्व की लहर से बांग्लादेश के हिन्दुओं को हिम्मत मिली, साहस मिला। उनका आत्मविश्वास जागृत हुआ, और कल का अभूतपूर्व आंदोलन संपन्न हुआ।
हम हमेशा यह समाचार सुनते आए हैं, कि पाकिस्तान में हिन्दुओं पर दुर्दांत अत्याचार हुए। उनका बलात धर्म परिवर्तन कराया गया। अनेक हिन्दू लड़कियों को भगाया गया… आदि। ऐसे ही समाचार बांग्लादेश से भी आते हैं। 1947 से 1975 तक पूर्व पाकिस्तान में, और 1975 से आज तक बांग्लादेश में, अनेक हिन्दू मंदिर समय-समय पर तोड़े गए। 1975 में पश्चिमी पाकिस्तानी सेना ने बांग्लादेश के हिन्दुओं का नरसंहार (genocide) किया। 2024 के अराजक वातावरण में पुनः यही हुआ। सैकड़ों हिन्दू मारे गए। भीड़ द्वारा पीट – पीट कर (Mob Lynching) तो अनेकों बार हिन्दुओं की हत्या की गई।
इन सभी अवसरों पर, ह्यूमन राइट्स की बातें करने वाले, मानवता का उपदेश देने वाले, सेकुलरिज्म का पाठ पढ़ने वाले हमेशा खामोश रहे। चुप्पी साध कर बैठे रहे।
ऐसा क्यों..?
भारत में भी लगभग 10% से 12% मुसलमान हैं। किंतु यहां अपवाद स्वरुप एक छोटी भी घटना हो जाती है, तो यह तमाम मानवाधिकार के पैरोकार, दुनिया में शोर मचाते हैं। अनेकों बार कुछ हुआ नहीं तो भी, ‘भारत में मुसलमान असुरक्षित’ का नारा घूमता है; जैसे कोरोना के समय गूंजा था।
फिर वही प्रश्न, बांग्लादेश और पाकिस्तान में हिन्दुओं पर होने वाले अत्याचारों की कोई बराबरी ही नहीं है। फिर भी, भारत में छोटी-मोटी घटना होने या ना होने पर भी, विश्व के माध्यम जगत में वह बड़ा समाचार बनता है, किंतु बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिन्दू नरसंहार का सादा समाचार भी प्रमुखता से नहीं छपता।
ऐसा क्यों..?
इसका कारण है – संगठन। भारत का मुस्लिम समुदाय संगठित है, भले ही अलग-अलग टुकड़ों में, या संगठनों में हो, किंतु संगठित है।
दुर्भाग्य से पाकिस्तान और बांग्लादेश के हिन्दुओं के बारे में ऐसा नहीं कह सकते। 1947 के पहले मुसलमानों का राजनीतिक दल था, ‘मुस्लिम लीग’। विभाजन के पश्चात भारत में मुस्लिम लीग की कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई। किंतु फिर भी मुस्लिम लीग जिंदा रही। उसने ‘इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग’ यह नया नामकरण कर लिया। केरलम में अपनी शक्ति बढ़ाते गए। उनके संसद सदस्य चुनकर आते गए। यूपीए का वह एक हिस्सा रहे। यूपीए के 10 वर्षों के शासनकाल में, उनका मंत्री, कांग्रेस के साथ मंत्रिमंडल का सदस्य था। आज भी केरलम में कांग्रेस का मुख्यमंत्री, इस मुस्लिम लीग की सहमति से और उसकी दम पर ही टिका है। अन्य मुस्लिम संगठन भी मुस्लिम राजनीति दमखम के साथ करते हैं।
विभाजन के पहले हिन्दुओं का एकमात्र राजनीतिक दल था, ‘हिन्दू महासभा’। दुर्भाग्य से, हिन्दुस्तान के हिन्दू उसे अपना दल नहीं मानते थे। अंग्रेज और मुसलमान, कांग्रेस को हिन्दुओं की पार्टी समझते थे। जबकि कांग्रेस अपने आप को हिन्दुओं की पार्टी नहीं मानती थी। कांग्रेस की सारी नीतियां मुस्लिम परस्त थीं।
विभाजन के बाद क्या हुआ? पश्चिमी पाकिस्तान में हिन्दू महासभा का थोड़ा बहुत कार्य था। उसके अनेक कार्यकर्ता भारत आ गए। जो वहीं पर डटे रहे, उनका भी मनोबल टूटा हुआ था। इसलिए 1950 के आते-आते, पश्चिम पाकिस्तान से हिन्दू महासभा का अस्तित्व समाप्त हो गया था।
तुलना में पूर्व पाकिस्तान में हिन्दू महासभा की कुछ ताकत थी। अविभाजित बंगाल में डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी और निर्मल चंद्र चटर्जी जैसे ताकतवर नेता, हिन्दू महासभा के पास थे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी के कारण ही पश्चिम बंगाल भारत में आ सका। अन्यथा पूरा बंगाल पाकिस्तान में मिलाने की बात हो रही थी।
किंतु पूर्वी पाकिस्तान बनने के बाद, वहां पर हिन्दू महासभा का कोई खास अस्तित्व नहीं रहा। 1950 में ढाका, बारिसाल, खुलना और अन्य क्षेत्रों में हिन्दू विरोधी दंगे हुए। इन दंगों के कारण, या तो हिन्दू समाज ने पलायन किया, या वह दबकर रह गया।
अर्थात, पूर्व और पश्चिम पाकिस्तान, दोनों में अच्छी खासी संख्या होने के बावजूद भी हिन्दू समाज राजनीतिक ताकत के रूप में सामने नहीं आया। दुनिया में शक्ति को ही सब प्रणाम करते हैं। हिन्दू यह राजनीतिक या सामाजिक शक्ति के रूप में नहीं रहा, तो स्वाभाविक था, उन पर अत्याचार बढ़ते गए।
आज बांग्लादेश में हिन्दुओं के कुछ सामाजिक संगठन हैं। सन् 2006 में कुछ हिन्दू संगठनों ने मिलकर, ‘हिन्दू महाजोत’ बनाया। किंतु इसकी गतिविधियां सीमित थीं। राजनीतिक शक्ति नहीं थी। अधिकतम हिन्दू, शेख हसीना सरकार की अवामी लीग को समर्थन देते थे। 2024 में अवामी लीग का तख्तापलट होने के बाद, हिन्दुओं पर जबरदस्त अत्याचार हुए। किंतु ‘हिन्दू महाजोत’ ने प्रारंभ में उन्हें राजनीतिक प्रतिशोध माना। इसलिए हिन्दू समाज से अपेक्षित प्रतिकार नहीं खड़ा हुआ।
किंतु कल का आंदोलन अपवाद था। बांग्लादेश का हिन्दू अब जाग गया है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण था।
पश्चिम बंगाल के चुनाव ने बहुत कुछ बदला है। अब बांग्लादेश के हिन्दू आत्मविश्वास के साथ, संगठित शक्ति का हुंकार भर रहे हैं। यह हिन्दुओं के लिए अत्यंत सकारात्मक दृश्य है।