बंदा बैरागी का बलिदान – देश और धर्म की रक्षा के लिए अदम्य साहस की गौरव गाथा

डॉ. शुचि चौहान

भारतीय इतिहास में अनेक वीरों ने अपने प्राणों का उत्सर्ग किसी राज्य, सिंहासन या व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के लिए नहीं, बल्कि अपने देश, धर्म और स्वाभिमान की रक्षा के लिए किया। ऐसे ही महापुरुषों में बंदा बैरागी, जिन्हें इतिहास में बंदा सिंह बहादुर के नाम से जाना जाता है, का स्थान अग्रणी है। उनका जीवन एक साधु से योद्धा बनने और अंततः धर्म तथा सिद्धांतों की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर कर देने की अद्भुत गाथा है। दुर्भाग्यवश भारतीय इतिहास लेखन में उनके व्यक्तित्व और बलिदान को वह स्थान नहीं मिला, जिसके वे वास्तविक अधिकारी थे।

बंदा बैरागी का जन्म 27 अक्तूबर 1670 को जम्मू-कश्मीर के राजौरी क्षेत्र में हुआ था। उनके पिता का नाम रामदेव और उनका बाल्यकालीन नाम लक्ष्मण देव था। वे बचपन से ही साहसी, पराक्रमी और शिकार के शौकीन थे। किंतु युवावस्था में घटी एक घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। कहा जाता है कि शिकार के दौरान उन्होंने एक गर्भवती हिरणी पर तीर चला दिया। घायल हिरणी की तड़पते हुए मृत्यु और उसके गर्भ से निकले शावक को देखकर उनके भीतर वैराग्य उत्पन्न हो गया। संसार की क्षणभंगुरता का अनुभव कर उन्होंने गृह त्याग दिया और साधना के मार्ग पर चल पड़े। बाद में वे माधोदास बैरागी के नाम से प्रसिद्ध हुए।

वर्षों तक देश के विभिन्न तीर्थों में भ्रमण और साधना करने के बाद उन्होंने नांदेड़ में अपना आश्रम बनाया। यहीं सन् 1708 में उनकी भेंट दसवें सिक्ख गुरु- गुरु गोविन्द सिंह जी से हुई। यह भेंट भारतीय इतिहास की निर्णायक घटनाओं में से एक मानी जाती है। उस समय गुरु गोविन्द सिंह जी के चारों पुत्र बलिदान हो चुके थे। बड़े साहिबजादे युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए थे और छोटे साहिबजादों, जोरावर सिंह और फतेह सिंह को सरहिन्द के सूबेदार वज़ीर ख़ान के आदेश पर जीवित दीवार में चिनवा दिया गया था। पंजाब और उत्तर भारत का बड़ा भाग मुगल अत्याचारों से त्रस्त था।

गुरु गोविन्द सिंह जी ने माधोदास को केवल व्यक्तिगत मोक्ष की साधना तक सीमित रहने के बजाय अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष का मार्ग अपनाने की प्रेरणा दी। माधोदास ने गुरु के चरणों में आत्मसमर्पण करते हुए कहा – “मैं आपका बंदा हूँ।” तभी से बंदा सिंह बहादुर कहलाए। गुरु ने उन्हें एक निशान साहिब, पाँच तीर, एक नगाड़ा तथा एक हुक्मनामा देकर धर्म और न्याय की रक्षा के लिए पंजाब भेजा।

पंजाब पहुँचकर बंदा सिंह बहादुर ने अत्याचार के विरुद्ध संगठित संघर्ष आरम्भ किया। उन्होंने समाना पर आक्रमण कर विजय प्राप्त की और श्री गुरु तेगबहादुर जी का शीश काटने वाले जल्लाद जलालुद्दीन का वध किया। इसके बाद सधौरा, कपूरी और अनेक अन्य स्थानों पर विजय प्राप्त करते हुए उन्होंने सरहिन्द की ओर प्रस्थान किया। 1710 में चप्पड़ चिड़ी के युद्ध में वज़ीर ख़ान पराजित हुआ और बंदा बैरागी के हाथों मारा गया। यह केवल सैन्य विजय नहीं थी; इसे अन्याय पर न्याय की विजय के रूप में देखा गया।

बंदा सिंह बहादुर ने सत्ता प्राप्त कर केवल शासन नहीं किया, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का प्रयास भी किया। उन्होंने किसानों को भूमि का अधिकार दिलाया और सामंती उत्पीड़न को चुनौती दी। यही कारण है कि वे केवल धर्म के लिए मर मिटने वाले योद्धा नहीं, बल्कि जननेता और समाज सुधारक के रूप में भी स्मरण किए जाते हैं।

मुगल सत्ता ने उन्हें समाप्त करने के लिए व्यापक सैन्य अभियान चलाया। अनेक युद्धों के बाद अंततः गुरदास नंगल में उन्हें घेर लिया गया। कई महीनों तक घेरा चलता रहा। भोजन और संसाधनों के अभाव में स्थिति अत्यंत कठिन हो गई। अंततः 17 दिसंबर, 1715 को बंदा सिंह बहादुर और उनके सैकड़ों साथी बंदी बना लिए गए।

उनकी गिरफ्तारी के बाद जो कुछ हुआ, वह भारतीय इतिहास के सबसे हृदयविदारक अध्यायों में से एक है। बंदा सिंह बहादुर को लोहे के पिंजरे में बंद कर हाथी पर बैठाकर दिल्ली लाया गया। उनके साथ सैकड़ों सिक्ख योद्धा भी कैद थे। समकालीन विवरणों के अनुसार मार दिए गए अनेक सिक्खों के कटे हुए सिर भालों पर टाँगकर जुलूस में प्रदर्शित किए गए ताकि जनता भयभीत हो। किंतु यह प्रदर्शन मुगल सत्ता की शक्ति का नहीं, बल्कि सिक्ख वीरों के साहस का प्रतीक बन गया।

मुगल इतिहासकार मिर्जा मोहम्मद हर्सी ने अपनी पुस्तक इबरतनामा में लिखा है कि हर शुक्रवार को नमाज के बाद सौ कैदियों को जत्थों में दिल्ली कि कोतवाली के बाहर कत्लगाह में लाया जाता था। काजी उन्हें इस्लाम कबूल करने का फतवा सुनाते। न मानने पर जल्लाद तलवारों से निर्ममतापूर्वक उनका कत्ल कर देते। यह दृश्य देखने के लिए बंदा को भी एक पिंजरे में बंद करके वहां लाया जाता। यह क्रम डेढ़ महीने तक चलता रहा।

बंदा बहादुर को मुसलमान बनाने के हर सम्भव प्रयास किए गए। लेकिन जब सारे प्रयास विफल रहे तो एक दिन उन्हें पिंजरे में ही महरौली ले जाया गया। काजी ने एक बार फिर इस्लाम कबूल करने का फतवा जारी किया, जिसे बंदा ने ठुकरा दिया, तो उनके चार वर्षीय अबोध पुत्र अजय सिंह को उनके पास लाया गया और काजी ने बंदा को अपने पुत्र की हत्या का निर्देश दिया। बंदा के मना करने पर बालक के शरीर को क्षत विक्षत करते हुए उसका हृदय निकालकर जबरन बंदा के मुंह में ठूंस दिया गया। बंदा सिंह बहादुर को लगातार अमानवीय यातनाएँ दी गईं। उनके शरीर को गर्म चिमटों से नोचा गया, अंग-भंग किया गया, उन्हें निरंतर पीड़ा पहुँचाई गई। किंतु वे विचलित नहीं हुए। उनके चेहरे पर भय का कोई चिन्ह नहीं था। अंततः उन्हें हाथी से कुचलवा दिया गया।

इतिहासकार इन विवरणों के स्वरूप पर भले अलग-अलग मत रखते हों, किंतु इस तथ्य पर कोई विवाद नहीं है कि 9 जून 1716 को दिल्ली में बंदा सिंह बहादुर को अत्यंत क्रूर और अमानवीय यातनाओं के बाद मृत्यु दी गई।

उनकी मृत्यु मुगल सत्ता की दृष्टि में एक विद्रोही का अंत थी, किंतु इतिहास ने इसे धर्म, स्वाभिमान और स्वतंत्रता के लिए दिए गए महान बलिदान के रूप में याद रखा। उनके बलिदान ने हिन्दू समुदाय की चेतना को और अधिक सुदृढ़ किया। जिस आंदोलन को समाप्त करने के लिए उन्हें मारा गया था, वही आगे चलकर और अधिक शक्तिशाली रूप में उभरा।

साधु से सैनिक बनने की यात्रा केवल व्यक्तिगत प्रतिशोध के लिए नहीं, बल्कि अत्याचार के विरुद्ध न्याय की स्थापना के लिए की। उनका जीवन त्याग, साहस, संगठन, नेतृत्व और अटूट आस्था का अद्वितीय उदाहरण है।

आज जब हम उनके बलिदान को स्मरण करते हैं, तो यह केवल अतीत के एक वीर का स्मरण नहीं होता बल्कि उन मूल्यों का स्मरण होता है, जिनके लिए उन्होंने अपने प्राण न्योछावर किए। बंदा सिंह बहादुर का नाम भारतीय इतिहास में सदैव उस योद्धा के रूप में अमर रहेगा, जिसने अपने पुत्र, साथियों और अंततः अपने प्राणों का बलिदान दे दिया, किंतु अपने विश्वास और स्वाभिमान से कभी समझौता नहीं किया।