ईंधन बचत का अभिनव प्रयोग; कार्यकर्ता विकास वर्ग में पर्यावरण अनुकूल व किफायती चूल्हे का उपयोगजलगांव। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पश्चिम क्षेत्र के कार्यकर्ता विकास वर्ग (प्रथम) का आयोजन जलगांव स्थित खान्देश एजुकेशन सोसायटी के एम. जे. कॉलेज में किया गया है। इस प्रशिक्षण वर्ग में 255 स्वयंसेवक शिक्षार्थी प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। इसके साथ ही 40 से 50 कार्यकर्ता विभिन्न व्यवस्थाओं में कार्यरत हैं। लगभग 500 से 600 लोगों के दैनिक भोजन प्रबंधन की बड़ी जिम्मेदारी वर्ग के सामने थी। और संघ की कार्यपद्धति के अनुरूप पर्यावरण अनुकूल, स्वदेशी और कम खर्च वाले विकल्प खोजने का प्रयास विशेष चर्चा का विषय बना है।

सामान्यतः, इतने लोगों के भोजन निर्माण के लिए प्रतिदिन कम से कम दो बड़े एलपीजी गैस सिलेंडरों की आवश्यकता पड़ती। प्रत्येक सिलेंडर का खर्च जोड़ने पर प्रतिदिन लगभग 6 हजार रुपये खर्च होने का अनुमान था। पूरे 21 दिनों के वर्ग के लिए यह खर्च सवा लाख रुपये तक पहुंचता। किंतु, स्वयंसेवकों ने इसका वैकल्पिक समाधान खोज निकाला।

धुले के स्वयंसेवक उद्योजक राहुल कुलकर्णी ने विशेष प्रकार का चूल्हा तैयार किया है। इस चूल्हे में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत का उपयोग किया जा रहा है। कपास अथवा तुअर (अरहर) के सूखे पौधों तथा गाय के गोबर के मिश्रण से तैयार ‘वुड ब्लॉक्स’, इस चूल्हे का मुख्य ईंधन हैं। बाजार में लगभग तीन रुपये प्रति किलो अथवा 150 से 200 रुपये प्रति बोरी की दर से वुड ब्लॉक्स आसानी से प्राप्त हो जाते हैं।

ईंधन बचत का अभिनव प्रयोग; कार्यकर्ता विकास वर्ग में पर्यावरण अनुकूल व किफायती चूल्हे का उपयोगइस प्रयोग के कारण जहां प्रतिदिन लगभग 6 हजार रुपये का एलपीजी खर्च अपेक्षित था, वहीं अब मात्र 300 रुपये में भोजन निर्माण हो रहा है। अर्थात प्रतिदिन बड़े स्तर पर ईंधन की बचत हो रही है और खर्च में भी कमी आई है। विशेष बात यह है कि यह विकल्प केवल सस्ता ही नहीं, बल्कि पर्यावरण के भी अनुकूल है। खेती से निकलने वाला जैविक अवशेष उपयोगी ईंधन में परिवर्तित हो रहा है, जिससे पर्यावरण संरक्षण को भी बल मिल रहा है।

सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने भी की सराहना

संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी तीन दिन तक वर्गस्थल पर उपस्थित रहे। उन्होंने वर्ग की सभी व्यवस्थाओं और गतिविधियों की विस्तृत जानकारी ली। इस चूल्हे के प्रयोग को स्वयं प्रत्यक्ष देखा और उसकी जानकारी प्राप्त की। उन्होंने इस अभिनव प्रयोग की सराहना की। उन्होंने कहा, “ऐसा प्रयोग देशभर में चल रहे संघ शिक्षा वर्गों और अन्य कार्यक्रमों में भी किया जा सकता है।”

जामनेर में चल रहे देवगिरि प्रांत के संघ शिक्षा वर्ग में भी इसी प्रकार के चूल्हे का उपयोग किया जा रहा है। जलगांव और जामनेर के प्रयोगों ने “कम खर्च में प्रभावी व्यवस्थापन” का एक आदर्श प्रस्तुत किया है। ग्रामीण क्षेत्रों, बड़े सामूहिक कार्यक्रमों तथा सामाजिक उपक्रमों में भी ऐसी वैकल्पिक ईंधन व्यवस्था उपयोगी सिद्ध हो सकती है।

पर्यावरण संरक्षण, ईंधन बचत और स्वदेशी तकनीक का सुंदर संगम प्रस्तुत करने वाला यह प्रयोग प्रेरणादायी है।