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रांची : आज लोकमन्थन 2018 के दोपहर भोजन के बाद के सत्रों में अर्थवलोकन सत्र चला। इस सत्र में वक्ताओं ने भारतीय अर्थ चिंतन पर प्रकाश डाला।श्रीमती संपतिया जी ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि विधानसभा लोकसभा से बढ़कर ग्राम सभा है। हमारे जनप्रतिनिधि चाहे वह पंच हो, सरपंच हो, Bharat VSK 29 09 18जिला परिषद सदस्य या जिला परिषद अध्यक्ष जो जनप्रतिनिधि चुनकर आते हैं तो उस समय बहुत उनमें से बहुत से ऐसे जनप्रतिनिधि होते हैं जो कम पढ़े लिखे होते हैं, जो अनुभव के माध्यम से जीतकर आ जाते हैं। ऐसे में जो सचिव होते हैं उन्हें लगता है कि यह जनप्रतिनिधि हैं, कम पढ़े लिखे हैं तो वे कोशिश करते हैं सरपंच को दबाने की और इस तरह से सरपंच यदि कोई बात को बताते हैं तो उन्हें लगता है कि हम जो बता रहे हैं वही सही है तो कुछ मामलों में सरपंच से ऊपर सचिव अपने आप को मानने लगते हैं और मैं भी अपने तरफ से अनुभव करती हूं कि जैसे ही पंचायत जनप्रतिनिधि जब जीत कर आते हैं उसी समय उनका समय पर शुरुआत में ही प्रशिक्षण हो जाता है तो भले ही वे कम पढ़े लिखे हैं पर प्रशिक्षण के माध्यम से उन्हें इतना पता चल जाता है कि हमारा अधिकार क्या है और हमको पंचायत कैसे चलाना है ऐसा सोचकर उन पंचायत के जनप्रतिनिधियों को उनके काम संविधान और उनके कर्तव्य के बारे में उनको पता हो तो ऐसी स्थिति में सचिव कभी हावी नहीं हो सकते।  पंचायत और ग्राम सभा जो कहती है उसी तरह से वह काम करते हैं अभी यह देखने को मिल रहा है कि जैसे ही पंचायत चुनाव हुए वैसे ही जनप्रतिनिधियों और सचिवों को प्रशिक्षण दिया गया, तो मैं अभी मानती हूं कि ऐसी कोई बाधा अब नहीं है। पंचायत के कारण अभी पूरी पारदर्शिता हो गई है और भ्रष्टाचार पर ग्राम सभा में प्रश्न उठाना सहज है। पहले से बेहतरीन व्यवस्था अभी पंचायती क्षेत्रों में बनी हुई है।श्री तुलसी तिवारी जी ने अर्थावलोकन विषय के अंतर्गत अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भारत एक अकेला देश है दुनिया में जिसमें 50% जनसंख्या के पास एक से दो एकड़ जमीन है, मगर हमारा किसान गरीब है क्योंकि हमने अर्थव्यवस्था को केंद्रित कर दिया है इसीलिए विकेंद्रीकरण करके अर्थव्यवस्था को वापस ले जाने की आवश्यकता है। पहले इंजीनियर भी साइकिल पर 30 किलोमीटर चलते थे यह नैतिकता की पराकाष्ठा थी फिर 1970 से लेकर 1980 तक के काल में भारत में सरकारी संस्थाओं में भ्रष्टाचार प्रारंभ हुआ और 1980 से लेकर 1990 तक के काल में वह व्यापारी जो अपने आप को व्यापारी कहते हैं, लेकिन है चोर; ऐसी प्रवृत्ति के लोग भारत में अर्थव्यवस्था के ऊपर  हावी हुए हैं। तकनीक अपने आप में एक ताकत है, यह प्रकृति की देन है। तकनीक उस चाकू की तरह है जो यह तय नहीं करता कि उसका प्रयोग करके हम गला काटे या फल काटे। तकनीक को लेकर शुभ और अशुभ होने की संभावना बराबर बनी रहती है। जो लोग शुभ सोचते हैं, जिनमें शुभ उद्यमिता करने की ताकत है, वह तकनीक को शुभ की और लेकर जाते हैं और जो अशुभ करना चाहते हैं वे इसी तकनीक का दुरुपयोग करना चाहते हैं। आज जितनी भी तकनीकों का हम प्रयोग कर रहे हैं उनमें से अधिकतम भारतीयों द्वारा विकसित हुई है। आगे और भी अच्छी तकनीक कैसे विकसित हो? शासन की और नीति की शक्ति उस पर कैसे लगे यह सोचना आवश्यक है। दुनिया की अर्थव्यवस्था चलाने वाले लोग मुद्रा पर सट्टा खेलते हैं और हम लोग जो मेहनत और मजदूरी से अपने काम में लगे हुए हैं एक झटके में हमारे पूरे के पूरे शुभ लाभ का जो धन है एक आदमी के पास सरककर चला जाता है। यह प्रक्रिया  विकराल और भयावह है, इसको समझे बिना हम बड़े नुकसान उठा रहे हैं।अर्थ के प्रति भारतीय चिंतन को जानने के जो भी सार्थक प्रयास देश और विदेश में चल रहे हैं वह आपस में जुड़े यह अत्यंत आवश्यक है ऐसे विचारशील व्यक्तियों के समूह को इस विषय को लेकर समग्रता से कार्य करने की आज महती आवश्यकता है जो आत्मीयता नैतिकता और विभिन्न विधाओं में निपुणता से परिपूर्ण हो। ऐसा होने पर ही भारत स्वयं और विश्व की अर्थव्यवस्था को भी एक नई दिशा की ओर ले जाने की ताकत रखता है तथा दैनंदिन जीवन में सामाजिक राजनीतिक आर्थिक और राष्ट्रीय परिवेश में प्रकृति प्रदत्त एकात्मता को स्थापित करने की ताकत भी रखता है। अर्थ में निहित दैवीय शक्ति सृष्टि में सृजनशील मानव की एक नई सभ्यता को जन्म दे सकती है ऐसा मेरा मानना है यदि हम मुद्रा की मर्यादा को बना के रखें।

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