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(रांची) बीएसएफ के डीजी केके शर्मा ने कहा कि रोहिंग्या मुसलमानों को पश्चिम बंगाल में शरण मिल रही  है। वहां रोहिंग्या की स्थिति बेहतर है। उनके लिए 70 कैंप बनाये गये हैं। पश्चिम बंगाल से सटा होने के कारण झारखंड के पाकुड़, साहेबगंज, जामताड़ा सहित कई जिलों में भी उनकी घुसपैठ हो चुकी है। इसलिए राष्ट्र हित में झारखंड में भी एनआरसी (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस) बहुत ही जरूरी है।
दिल्ली में सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) और सीमा गार्ड बांग्लादेश (बीजीबी) के बीच 47वीं डीजी स्तर की बैठक चल रही हैं। उसमें बीएसएफ के डीजी केके शर्मा ने कहा कि म्यांमार से भागकर ज्यादातर रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश में जुट रहे हैं। वहां से छोटे-छोटे समूहों में भारत में घुसपैठ करने का प्रयास कर रहे हैं, सीमा सुरक्षा बल नाकाम कर रहा है। 
स्थिति देखिये, असम में एनआरसी में करीब 40 लाख लोगों को अवैध नागरिक के रूप में चिह्नित करने पर कुछ विपक्षी दलों ने संसद के भीतर और बाहर जमकर हंगामा किया। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि वे राष्ट्रीय महत्व के इस मसले को भी वोट बैंक के चश्मे से देख रहे हैं, लेकिन ऐसा करके वे राष्ट्रीय हितों की अनदेखी कर रहे हैं। कई विपक्षी दलों का व्यवहार भ्रम फैलाकर राजनीतिक रोटियां सेंकने वाला है, लेकिन तृणमूल कांग्रेस की नेता और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का रवैया सबसे आपत्तिजनक है। ऐसा लगता है कि वे बांग्लादेश से अवैध तरीके से भारत आकर रहने वाले लोगों की अगुआ बनना चाह रही हैं क्योंकि ये घुसपैठिये चुनावी हार-जीत में निर्णायक साबित होने लगे हैं। अब झारखंड में एनआरसी लागू कराने के लिए राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में है। मुख्यमंत्री रघुवर दास ने मुख्य सचिव और गृह सचिव को सुप्रीम कोर्ट में असम में चल रहे एनआरसी मामले में झारखंड की ओर से भी इंटरवीनर पिटीशन दायर करने को कहा है। गृह विभाग ने इसकी तैयारी शुरू कर दी है। जल्द ही सुप्रीम कोर्ट में एक पिटीशन दायर कर झारखंड में भी एनआरसी लागू करने की मांग की जाएगी। कोर्ट से कहा जायेगा कि अगर असम में एनआरसी लागू हो सकता है तो झारखंड में क्यों नहीं। राज्य में एनआरसी कराने के लिए पहला पत्र 10 जनवरी 2018 को झारखंड के गृह विभाग ने केंद्र सरकार को भेजा था। उसके बाद फिर 25 जुलाई को एक रिमाइंडर भेजा गया और एनआरसी लागू करने की अनुमति मांगी गई। वैसे अब तक केंद्र की ओर से इस पर कोई आदेश नहीं आया है। वहां से हरी झंडी मिलते ही झारखंड के सीमावर्ती जिलों में तेजी से पैठ बना रहे बांग्लादेशी घुसपैठियों को चिह्नित कर नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन (एनआरसी) बनाने की कार्रवाई होगी। यह अभियान असम की तर्ज पर चलेगा। दरअसल बड़ी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठियों की मौजूदगी ने झारखंड के पाकुड़, साहिबगंज, जामताड़ा और गोड्डा का सामाजिक-आर्थिक संतुलन बिगाड़ दिया है। इसका सीधा असर स्थानीय लोगों पर पड़ रहा है। वोट बैंक के चक्कर में इन्हें राजनीतिक संरक्षण दिया जा रहा है। इस वजह से पड़ोसी मुल्क से घुसपैठ कर आने वाले लोगों ने तमाम सरकारी सुविधाएं भी हासिल कर ली है। वे यहां की आदिवासी महिलाओं से शादी कर जमीनें भी खरीद रहे हैं। जाली नोट का कारोबार भी इसकी आड़ में चल रहा है। जामताड़ा साइबर क्राइम का गढ़ बन गया है। इन इलाकों में बांग्लादेश का आतंकी संगठन जमात-उल-मुजाहद्दिीन बांग्लादेश भी सक्रिय है। इसके अलावा प्रतिबंधित पीएफआई (पीपुल्स फ्रंट ऑफ इंडिया) ने भी अपना जाल यहां फैला रखा है। विशेष शाखा ने इनकी गतिविधियों के मद्देनजर राज्य सरकार को सतर्क भी किया है। पाकुड़ एसपी शैलेंद्र वर्णवाल कहते हैं कि सरकार से निर्देश मिलते ही घुसपैठियों की पहचान करने की दिशा में पुलिस कार्रवाई आरंभ करेगी। यह आवश्यक भी है। जिला प्रशासन के साथ मिलकर पुलिस इसे अंजाम देगी। नि:संदेह भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, लेकिन धर्मशाला नहीं। इसलिये सरकार को कड़ाई से एनआरसी लागू कर बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकाल बाहर करना चाहिये। नहीं तो इसके दुष्परिणाण हमलोगों को भुगतने पड़ेंगे क्योंकि हमें यह नहीं भुलना चाहिए कि हमारे देश का बंटवारा क्यों हुआ था।
(राजीव मिश्रा)

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