“धर्म” रक्षण के लिए जीवन – रेखाताई राजेॐ नमो विश्व शक्तै नमस्ते नमस्ते

इस्लाम के जाल में फँसी, अपने स्वधर्म और अपने शरीर को नष्ट कर चुकी युवतियों को उससे बाहर निकालकर, उनके बच्चों सहित उन्हें सभ्य और संस्कारी मार्ग दिखाना, और उनका पुनर्वास करना – ऐसे कई साहसी काम करते हुए रेखाताई ने बहुत पहले से ही स्त्री शक्ति का साहसी प्रदर्शन किया है। और यह सब उन्होंने जम्मू-कश्मीर जैसे अति संवेदनशील क्षेत्र में किया, जहाँ सभी प्रकार की प्रतिकूलता थी और उन्हें उपेक्षा तथा अपमान का सामना करना पड़ता था, फिर भी उन्होंने यह माना कि “हिन्दुत्व की रक्षा ही मेरा धर्म है”…! वैसे तो उस समय लव जिहाद शब्द भी प्रचलित नहीं हुआ था, कार्यकर्ताओं में ही जागरूकता नहीं थी, तो सहयोग कहाँ से मिलता? सभी प्रकार की कठिनाइयों पर काबू पाते हुए उन्होंने अपना कार्य जारी रखा था।

उनका जम्मू-कश्मीर में प्रवास 84/85 के बाद शुरू हुआ। ठीक उसी समय जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद अपने चरम पर था। हिन्दुओं की हत्याएं हो रही थीं। आगजनी और लूटपाट को बढ़ावा मिल रहा था। कश्मीरी पंडितों का पलायन बड़े पैमाने पर शुरू हो गया था। उनके पुनर्वास की आवश्यकता थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने खुद को इस काम में झोंक दिया। इसमें समिति ने और वहाँ प्रचारिका (पूर्णकालिक कार्यकर्ता) के रूप में जाने वाली स्वर्गीय सिंधुताई फाटक और रेखाताई राजे ने बहुत बड़ा योगदान दिया है। स्थानीय महिला कार्यकर्ताओं को संगठित करना, गाँव-गाँव घूमकर उनकी हिम्मत बढ़ाना, आवश्यकतानुसार मदद करना – ऐसे कई कामों में रेखाताई आगे थीं।

जिन लोगों को अपना जीवन गंवाना पड़ा, उन पीड़ितों की बेटियों के लिए जम्मू में “अदिती” छात्रावास शुरू किया गया। इसमें रेखाताई का बड़ा योगदान है। अब इसका काम तमिलनाडु की पंकजा अक्का के पास है।

जम्मू-कश्मीर की तरह ही दूसरा संवेदनशील हिस्सा पंजाब था। खालिस्तान के उग्र आंदोलन चल रहे थे। उस समय हिन्दुओं की एकता को अखंड बनाए रखने के लिए जो प्रयास हुए, उनमें भी रेखाताई का महत्वपूर्ण योगदान है। लंबे समय तक उनका केंद्र दिल्ली रहा, लेकिन मुख्य रूप से पंजाब और जम्मू-कश्मीर की ज़िम्मेदारी उन्हीं पर थी। बाद के समय में आतंकवाद से पीड़ित घरों की बेटियों के लिए जालंधर में छात्रावास खड़े हुए। कारगिल युद्ध के बाद लद्दाख की लड़कियों के लिए भी जालंधर में छात्रावास का निर्माण हुआ। इन सभी कार्यों में अन्य कई लोगों की तरह रेखाताई की भूमिका अनमोल है। भावनात्मक एकता बनी रहे और समिति का कार्य बढ़े, इसके लिए उन्होंने पंजाब को छान मारा था।

जब रेखाताई पर उत्तर क्षेत्र प्रचारिका की ज़िम्मेदारी आई, तो उनका प्रवास हरियाणा, हिमाचल आदि क्षेत्रों में भी शुरू हो गया। विशेष रूप से सीमावर्ती क्षेत्रों में संपर्क करना, वहाँ की समस्याओं को समझना और उनके समाधान के लिए प्रयास करना – इस पर उन्होंने ध्यान केंद्रित किया था।

एक समर्पित जीवन की कहानी

राष्ट्र सेविका समिति की पहले के समय की, दृढ़ निश्चय के साथ निकली प्रचारिका थीं रेखाताई राजे। उनका जन्म पुणे में हुआ। समिति की शाखा से उनका संबंध नासिक में हुआ। वहाँ उनकी पहचान वं. मौसी केळकर से हुई। उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उन्होंने अपने जीवन में समिति को अग्रस्थान पर रखने का निश्चय किया। बहुत कम समय नासिक में रहने के बाद वह अपने घर कानपुर चली गईं, जहाँ वह शिक्षा और समिति का कार्य एक साथ करने लगीं। वह तेज़ी से शाखाएं बढ़ाने के पीछे लग गईं। घर संघ से जुड़ा हुआ था। वहाँ उनका अशोक जी सिंहल से सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित हुआ। उनके प्रोत्साहन और मार्गदर्शन में उन्होंने समिति की प्रचारिका के रूप में काम करने के अपने निश्चय को साकार किया।

उन्होंने समाजशास्त्र विषय लेकर एम.ए., बी.एड., एम.एड. की शिक्षा प्राप्त की और अध्यापन का काम शुरू किया। कुछ वर्षों तक पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही उनका कार्यक्षेत्र था।

पढ़ाई के दौरान ही देश पर लोकतंत्र का गला घोंटने वाला आपातकाल थोप दिया गया। सत्याग्रहियों में रेखाताई सबसे आगे थीं, लेकिन उम्र में सबसे छोटी! उन्हें तीन महीने और 15 दिन की सज़ा हुई। मन में भय पैदा करने के लिए उन्हें पागल और अपराधी महिलाओं के साथ रखा गया था। एक प्रसंग ऐसा है कि उन्हें एक गर्भवती महिला का प्रसव कराना पड़ा! वह भी तब जब उन्हें कुछ भी पता नहीं था! उन साढ़े तीन महीनों में उन्होंने ऐसे कई प्रसंग झेले।

1984 में रेखाताई का केंद्र दिल्ली बन गया। वहाँ, प्रथम प्रचारिका सिंधुताई फाटक के मार्गदर्शन में समर्थ शिक्षा समिति के अंतर्गत रेखाताई का काम शुरू हुआ। वह उनके साथ दिल्ली सहित उत्तर क्षेत्र की यात्रा करती थीं।

रेखाताई को अखिल भारतीय सह शारीरिक प्रमुख और उसके बाद सहकार्यवाहिका जैसी ज़िम्मेदारियां मिलीं। इस कारण उनका देशभर में प्रवास शुरू हुआ।

मेरी उनसे पहचान मेरे स्कूल के दिनों से ही है। एक वर्ग में हमारी मुलाकात हुई। उनके हँसमुख चेहरे ने मुझे मोहित कर लिया और उनके बारे में सुने गए साहसिक कार्यों के कारण वह बहुत अच्छी लगने लगीं। बाद में हमारी मुलाकातें भी बढ़ीं। वह मेरे घर पर विशेष रूप से आती रहीं। जब मैं दिल्ली जाती थी, तो हमारी बहुत सारी अनौपचारिक बातचीत होती थी। संगठनात्मक प्रश्नों और स्थितियों के बारे में उनसे बात करने पर मार्ग ज़रूर निकलता, यह मेरा लंबे समय का अनुभव रहा।

हल्दी के एक छोटे से टुकड़े से पीला हो जाने वाली (छोटी सी उपलब्धि से ख़ुश होने वाली) प्रजा को देखकर, इतना बड़ा साहसिक काम करके भी प्रसिद्धि से दूर रहने वाली रेखाताई ज़रूर याद आती हैं। बिना किसी इच्छा या महत्वाकांक्षा के कोई व्यक्ति कैसे हो सकता है? रेखाताई वैसी ही थीं..!

हाल ही में फ़ोन किया, तो उन्होंने कहा, “एक समय मैंने पूरे शरीर को बहुत कष्ट दिया, हाथ-पैर दोनों को खूब चलाया। अब उन्होंने सत्याग्रह कर दिया है, मुझे कुर्सी से बाँधकर रखा है!” इस स्थिति के बारे में भी उन्हें कोई शिकायत नहीं है! वह जीवन के बदलावों को सहजता से स्वीकार करती रहीं।

“देवदुर्लभ” कार्यकर्ता संघ-समिति कार्य की विशेषता है। ऐसी दीपमाला में रेखाताई एक तेजस्वी तारा हैं।

ईश्वर से प्रार्थना है कि उन्हें अपने चरणों में स्थान दें।

ताई को दंडवत!

सुनीला सोवनी

(पूर्व में प्रकाशित, आंशिक संशोधन के पश्चात पुनः प्रकाशित)