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प्रवासन : समस्या से संसाधन की राह

रांची , 25 मई : लॉक-डाउन के कारण लोगों का व्यापक पलायन देखने को मिला है, जिसका प्रमुख कारण अंतर-राज्य प्रवासियों द्वारा वृहद पैमाने पर किया गया आवागमन है।  वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में आंतरिक प्रवासियों की कुल संख्या 45.36 करोड़ है, जो देश की जनसंख्या का लगभग VSK JHK 15 05 202037% है। देश में अंतर-राज्य प्रवास के आधिकारिक आंकड़े मौजूद नहीं हैं लेकिन सीएसडीएस (CSDS) के आंकड़ों के अनुसार देश में अंतर-राज्य प्रवासियों की संख्या 65 मिलियन है। इसमें लगभग 33% श्रमिक कामगार हैं अर्थात लगभग 20-22 मिलियन अंतर-राज्य श्रमिक है। जो कोरोना काल में घर वापसी की कामना करते हुए अपने मूल स्थान पर लौटना चाहते हैं।

वर्तमान समय मे निश्चय ही श्रमिकों की घर वापसी एक विकट समस्या के रूप में सामने खड़ी है परंतु उससे कहीं अधिक आवश्यक है कि श्रमिकों की घर वापसी सुरक्षित भी हो। सोशल डिस्टेंसिंग के साथ न केवल आवागमन सुनिश्चित करना ही एक मात्र लक्ष्य है, अपितु उनकी क्वॉरेंटाइन की व्यवस्था भी करोना महामारी से सुरक्षा हेतु उतना ही आवश्यक है। यही कारण है कि केंद्र सरकार राज्यों से समन्वय की वकालत करता है और राज्यों की मांग के अनुसार परिवहन परिचालन कर रहा है। अतः इस पर राजनीति व्यर्थ है।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इन प्रवासी श्रमिकों का एक चौथाई केवल उत्तर प्रदेश से संबंधित है जबकि बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश के आंकड़े को भी यदि उत्तर प्रदेश के प्रवासी श्रमिकों के साथ सम्मिलित किया जाए तो यह आंकड़ा आधे से भी अधिक होता है। अर्थात लौटने वाले श्रमिकों के वृहत्तर भाग का केंद्र केवल चार राज्यों में है। संख्या बल की वृहद्त्ता और उसके बाद की अराजक भयावह स्थिति के आकलन करने में असमर्थ व्यक्ति ही सरकार की आलोचना या भर्त्सना कर रहे हैं और संकट की इस घड़ी में भी श्रमिकों को दिग्भ्रमित कर उन्हें पलायन के लिए उकसा रहे हैं।

प्रवासन क्यूँ ?

यहां आवश्यक रूप से उन कारणों की भी चर्चा की जाए जिनके कारण श्रमिकों या कामगारों का  प्रवासन मूल निवास से अन्यत्र हुआ। निश्चय ही इसके मुख्य कारण बेहतर जीवन यापन, रोजगार व अवसर की उपलब्धता जैसे आकर्षण हैं जो इन्हें अपने मूल स्थान से वर्तमान निवास की ओर पलायन करने के लिए आकृष्ट करते हैं। यद्यपि शुद्ध-प्रवसन (Net Migration) के संदर्भ में यह स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है कि उत्तर प्रदेश एवं बिहार जैसे राज्यों से शुद्ध-प्रवसन सर्वाधिक होता है। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गोवा आदि राज्य शुद्ध-प्रवासन प्राप्तकर्ता हैं,  जबकि झारखंड, मध्य प्रदेश आदि शुद्ध-प्रवासन दाता राज्य हैं। आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि उत्तर-भारत से दक्षिण-पश्चिम भारत या पिछड़े राज्यों से अपेक्षाकृत अधिक विकसित राज्यों की ओर प्रवासन का ट्रेंड रहा है। यहां यह कहना भी जायज है कि विकास की असमानता प्रवास का मूल कारण है। अब यह प्रश्न समय समीचीन हो जाता है कि इस असमान विकास का उत्तरदायी कौन है? वह कौन से कारक हैं जिसके कारण विकास महानगरों तक ही सीमित रहा?

उपर्युक्त प्रश्नों के उचित जवाब के लिए भारतीय नीति-निर्धारण और विकास के विभिन्न योजनाओं के समेकित अध्ययन और अवलोकन की आवश्यकता है। स्वाधीनता के पश्चात योजना आयोग का गठन, यूएसएसआर (USSR) के तत्कालीन राष्ट्रपति जोसेफ स्टालिन के आयातित विचारों का देशीकरण करने की कोशिश थी। भारत ने समाजवाद का रास्ता जरूर चुना, किंतु भारत में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र दोनों की मौजूदगी की वजह से यूएसएसआर (USSR) की तरह व्यापक योजना लागू करना मुश्किल था। इसलिए यहां निजी क्षेत्र को अलग हटाकर केवल सार्वजनिक क्षेत्रों के लिए योजनाएं बनाई जाने लगी। 

विकास के इस केंद्रीयकृत मॉडल में केंद्र को असीमित वित्तीय अधिकार थे और इसकी आत्मा समानुपातिक धन आवंटन में निहित थी। परंतु केंद्र- राज्य के अंतर राजनैतिक संबंधों के कारण राज्यों में समानुपातिक वितरण नहीं हो पाया। धन एवं योजनाओं की असमान वितरण ने कालांतर में क्षेत्रीय असमानता को और भी अधिक गहरा किया। बिहार और झारखंड (एकीकृत बिहार) उपजाऊ मृदा और खनिज की प्रचुरता के बावजूद पिछड़े रहे। उत्पादन की असीमित क्षमता के बावजूद उत्तर प्रदेश सहित अन्य उत्तर भारतीय राज्य, हरित क्रांति से अछूते रहे। 

बदलते राजनैतिक परिवेश में योजना आयोग, केंद्र सरकार के डंडे के रूप में कार्य करने लगा और राज्यों को उपकृत करने या दंड देने के रूप में भी इसका इस्तेमाल किया जाने लगा। इसका अप्रोच भी top-to-bottom था, जिससे राज्य अपने अनुरूप नीति ना बनाकर जबरन थोपी गई नीति पर ही कार्य कर रहे थे। उपयुक्त सभी कारणों से देश के अंदर असमान विकास की प्रवृत्ति परिलक्षित हुई। यहां तक कि एक ही राज्य के कुछ खंड विकसित हो गए और अधिकांश भाग पीछे रह गए। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरू, सूरत, हैदराबाद, गुरूग्राम, गौतम बुध नगर (नोएडा) आदि इसी असमान विकास के विकसित खंड के उदाहरण हैं। 

वर्तमान प्रवासी श्रमिकों की समस्या भी इन्हीं ‘विकसित खंड’ में सर्वाधिक परिलक्षित होती है। अतः यह कहना सर्वथा सत्य ही होगा कि वर्तमान की समस्या की कहानी दशकों पूर्व से लिखी जा रही थी जो कि इस महामारी के काल में दृष्टिगोचर हो रही है।

प्रवासन का निदान : क्या यह संसाधन बन सकता है?

स्पष्टतया विकसित स्थल में श्रम की मांग होती है जिसकी आपूर्ति श्रमाधिक्य क्षेत्रों से अबाध रूप से होती है। श्रम के कुशल प्रबंधन द्वारा श्रम-संतुलन कायम करके प्रवासन की समस्या से बचा जा सकता है। श्रमाधिक्य क्षेत्र में रोजगार का सृजन कर एवं गुणवत्तापूर्ण जीवनयापन का अवसर प्रदान कर,  पलायन को अनुकूलतम स्तर पर स्थिर किया जा सकता है। श्रम, तकनीक और प्रकृति के सम्यक सामंजन से ही संसाधन निर्मित होते हैं। आवश्यकता है कि इनका प्रबंधन इस प्रकार हो कि संसाधन का इष्टतम लाभ प्राप्त किया जा सके।

भारत में श्रमाधिक्य के कारण इसे बोझ के रूप में देखा जाता है, किंतु तकनीक का प्रयोग कर इसे संसाधन बनाए जाने की आवश्यकता है। इसके लिए यह जरूरी है कि ग्रामीण- नगरीय प्रवास की बढ़ती दर को कम किया जाए। श्रमिकों को उनके मूल स्थान पर ही अवसर प्रदान किए जाएं। लघु और कुटीर उद्योग के जरिए स्वरोजगार को बढ़ाया जाना इस दिशा में सहायक साबित होगा। स्थानीय जरूरत की मांग का उत्पादन, स्थानीय स्तर पर हो और वहां स्थानीय श्रम को अवसर प्रदान किया जाए। बुनियादी अधिकार और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिये। प्रवासित परिवारों को गंतव्य क्षेत्रों में नागरिक अधिकार मुहैया कराया जाना चाहिये ताकि वे गरीबों को मिलने वाली बुनियादी सुविधाएँ, सार्वजनिक कार्यक्रमों के लाभ और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं तक पहुँच सकें और इन सभी सेवाओं को सुनिश्चित करने के लिये एक प्रमुख नीति की आवश्यकता है । प्रवासी श्रमिकों के लिये पूरे भारत में श्रम बाज़ार को विभाजित किया जाना चाहिये और कार्यकाल की सुरक्षा के साथ एक अलग श्रम बाज़ार विकसित किया जाना चाहिये।

भारत के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत के श्रम का 50% कृषि पर आश्रित है जबकि सकल घरेलू उत्पाद में इसकी हिस्सेदारी महज 17% -18% है। यही श्रमाधिक्य कालांतर में प्रवास की ओर उन्मुख होता है और प्रवासन में उत्तरोत्तर वृद्धि होती रहती है। अतः यह आवश्यक है कि ‘जीवन निर्वाह कृषि व्यवस्था’ को ‘उद्यम कृषि’ में बदला जाए, जहां प्रत्येक कृषक की भूमिका उद्यमी के रूप में हो और वह सेवा-प्रदाता बनकर अवसरों का सृजन करें। ग्रामीण क्षेत्रों में ढांचागत सुधार कर एवं पूंजी के प्रवाह को सुगम बनाकर ग्रामीण भारत को आत्मनिर्भर बनाए जाने की आवश्यकता है। तकनीकी सहायता से श्रम का डेटाबेस बनाया जाए एवं इसी आधार पर श्रमाधिक्य क्षेत्र से, श्रम की मांग के क्षेत्र में, श्रम का प्रवाह सुनिश्चित किया जाए। श्रम के उचित प्रबंधन के द्वारा  ना केवल प्रवासी श्रमिकों की समस्या का निदान होगा बल्कि एक संसाधन के रूप में यह समग्र विकास का वाहक भी बनेगा।

 डॉ अपर्णा

सहायक प्राध्यापक ,राजनीति एवं अंतराष्ट्रीय संबंध विभाग 

केन्द्रीय विश्वविद्यालय झारखंड, रांची


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