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एकांत में आत्म साधना और लोकांत में परोपकार  : मोहन भागवत जी

VSK JHK 08 05 2020रांची , 08 मई : बदलते संदर्भ के साथ संघकी द्रव्यता इसे हर युग में प्रासंगिक और अपरिहार्य रखती है। संघ की यह विशेषता इसके मूल्यों को परिवर्तित नही करता बल्कि बदलते आवरण में अपना व्यवहार बदल कर हर चुनौती का सामना करने की क्षमता देता है। स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए माननीय मोहन भागवत जी ने सेवा ही मुख्य कार्य है का संकल्प पुनः प्रतिपादित किया। एक चिनी भिक्षुक के उद्दाहरण से संचित धन का स्वाभाविक एवमं उपयुक्त उपयोग सेवा है । ऐसा संदेश उन्होंने अपने देश को दिया। परिवर्तित संदर्भ में कार्यक्रम बदल कर काम करना ही संघ की आवृत्ति है। संघ बिना नियोजन के कोई भी प्रयोजन नही करता,जिससे संघ के सभी कार्य यशस्वी होते है। अपने स्वयंसेवकों को इस बात का पुनः भान कराते हुए उन्हें इस विपदा की घड़ी में सुनियोजित प्रयास करने को कहा। जैसा कि हम सब जानते है संघ का काम समाज के सहयोग से पूरा होता है और संघ इसका श्रेय स्वयं कभी नही लेता। सोच विचार कर कोई भी कार्य करने से आत्मविश्वास बना रहता है और किसी भी प्रकार का भय या दुविधा मन में नही रहती। श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ‘अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते,असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ।।‘को चरितार्थ करने की प्रेरणा उन्होंने दी । दान सदा सतकार और बिना अहंकार से करना चाहिए और किसी कुपात्र को आपके दान का लाभ ना मिले ये भी सुनिश्चित करना हमारा उत्तरदायित्व है। भारत की यह परंपरा रही है कि अपना थोड़ा बहुत ह्रास कर के भी हम परेशानी में मदद मांगने वालों की मदद करते हैं, जैसा कि दूसरे देश में दवाइयां भेज कर हमनें किया। हमने सदा सभी के सुख की कामना के साथ अपनत्व का भाव रखकर विश्व के अन्य देशो से संबंद्ध स्थापित किया है।

समस्त विश्व इस महामारी से निबटने की बात सोच रहा है परंतु सरसंघचालक जी जैसे कालजयी विचारों वाले लोग भविष्य को गढ़ने की योजना बनाते हैं। उन्होंने अपने वक्तव्य में नव भारत का आधार क्या हो इसकी बात कही। ग़ांधी जी की तरह स्वदेशी और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का निर्माण करने पर विचार करना होगा, ऐसा आर्थिक कानून जो भौतिक प्रगति के साथ-साथ सामाजिक सद्भाव और नैतिक उन्नति का आधार हो और जिससे प्रकृति का सन्तुलन अक्षुण्ण रहे। आज जब हम इस महामारी से जूझ रहे हैं तो हम सब अपने जीवन में बदलाव का संकल्प करते हैं परंतु कठिन और विपदा के समय में लिया हुआ संकल्प शमशान वैराग्य की तरह अल्पकालिक होता । इसी दुर्बलता से स्वयं को बचा कर आने वाले समय में जीवन की शैलीके बदलाव से राष्ट्र का पुनर्निर्माण संभव हो पाएगा। उपभोक्तावादी सोच को त्याग कर उन्ही वस्तुओं का उपयोग करना होगा जो अपने यहाँ निर्माण हो सके। हमने देखा कि पश्चिम की उपभोक्ता वादी नीति ने हमे वस्तुओं का दास बना दिया है। हम अनावश्यक वस्तुओं का संग्रहण करने लगे और यही हमारे जीवन की प्राथमिकता हो गयी परंतु पश्चिम के द्वारा यह उन्नति की परिभाषा खोखली और गुब्बारा की तरह वायुयुक्त निकली, चार महीने की विपदा और विश्व के बड़े से बड़े उद्योग, मल्टीनेशनल कंपनी घुटने पर आगए जो मिलियन और बिलियन डॉलर के लाभ का दावा करती थी। नव भारत का निर्माण कैसा हो , इसमें प्रगति के मानक क्या हो और समाज की आकांक्षाऐं क्या हो?  इन सब बातों पर विचार करने की आवश्यकता है। पश्चिम ने हमपर प्रगति के जो मानक थोपे क्या उन मानकों के साथ हम पुनः आगे बढ़ेंगे या अपनी क्षमताओं, अपनी वास्तविकताओं और अपनी चुनौतियों के अधार पर हमें नव मनको का निर्माण करना पड़ेगा। यही नए मानक नए भारत का आधार बनेंगे।

अपने स्थापना के समय से संघ ने सदा राष्ट्र की विपत्ति में सरकार के प्रयासों को बल दिया है फिर चाहे सरकार किसी की भी रही हो। वर्तमान में भी जिस प्रकार संघ के स्वयंसेवक बिना किसी की पृष्ठभूमि जाने देश के सुदूर क्षेत्रों में मदद पहुंचा रहे है, भागवत जी ने इसकी सरहना की। ऐसी विपदा की घड़ी में किसी भी प्रकार की आंतरिक अशान्ति पूरे राष्ट्र के अस्तित्व को खतरे में डाल सकती है । इसलिए लोगों से सौहार्द्र बनाये रखने की अपील की । बिना किसी विवाद में उलझे समाज में सेवा कार्य चलते रहना चाहिए । ऐसी उन्हें अपने स्वयंसेवकों से अपेक्षा है। धृति, दृष्टि, मति और दाक्य का प्रयोग कर लोगों की मदद करने का आवाहन किया । स्वयं को सुरक्षित रखकर ही दूसरों की सेवा की जा सकती है। भागवत जी ने सभी से उदाहरणात्मक व्यवहार की अपेक्षा के साथ लोगों में इस प्रकार के व्यवहार को पोषित करने को कहा।

अभिभावक की भांति माननीय मोहन भागवत जी ने पूरे देश को विपदा की घड़ी में एक होकर सरकार के प्रयासों को सफल बनाने के लिए प्रेरित किया। महाराष्ट्र में साधुओं के साथ क्रूरता पूर्ण व्यवहार और उनकी मृत्यु धर्म का क्षरण है, इसके विरोध में सभी हिन्दू संगठनों द्वारा किये गए आवाहन का समर्थन राष्ट्र स्वयंसेवक संघ भी करता। हिंदू समाज को संगठित होकर ऐसे असामाजिक तत्वों से निबटने की आवश्यकता है। देशविरोधी ताकतों को परास्त करने के लिए समाज को संगठित रहना आवश्यक है। आज पूरा विश्व हमारे पुरातन संस्कारों का अनुसरण कर रहा है, यही इसकी चिरकालिक अपरिहार्यता का प्रतीक है।

सरसंघचालक माननीय मोहन भागवत जी ने समस्त मानव के कल्याण के लिए 130 करोड़ भारत वासीयों को इस संकट की घड़ी में आपसी सहयोग का संदेश दिया है। राष्ट्र स्वयंसेवक संघको सेवा गतिविधियों और सामाजिक और सांस्कृतिक प्रक्रिया में अपनी ताकत के समायोजन करने की कला पता है। यहां संघ की नैतिक शक्ति उभरती है। डॉ मोहन भागवत जी का संबोधन प्रेरित बलों द्वारा बनाई गई जटिल समस्याओं को देखने के लिए उदार दृष्टिकोण के उच्चतम चरण की अभिव्यक्ति है।

अपर्णा सिंह ,राष्ट्र सेविका समिति


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