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महालया : तपस्या में अस्तित्व की तलाश

श्री मयंक मुरारी

रांची, 05 अक्टूबर : समाज में मनुष्य का मूल्यांकन उसकी प्राप्ति के आधार पर होता है लेकिन महान लोग ऐसा नहीं सोचते हैं। वह इस तरह के मूल्यांकन कभी नहीं चाहते हैं। वह अपने कर्म का निर्धारण खुद करते है। तपस्या ही मनुष्य को इस योग्य बनाती है कि व्यक्ति अपनी मूल्य का निर्धारण कर सके। महालया इसके लिए अवसर प्रदान करती है। इससे तप का मार्ग खुलता है, जिसमें व्यक्ति शक्ति प्राप्त करता है। यह दोनांे भौतिक और आंतरिक जीवन के लिए जरूरी होता है। क्वांर के पहले पक्ष पितृ तर्पण से क्लांत मन के लिए व्यक्ति शक्ति की खोज करता है। ऐसे में महालया के साथ एक यज्ञकर्म का पक्ष शुरू होता है, जो पूरे एक पक्ष तक चलता है। इसमंे व्यक्ति तप रूपी अग्नि को अपने मन में प्रज्जवलित करता है। तप रूपांतरित करता है। यह भूख को मिटाता है। भूख ही सारी समस्या का कारण है। यज्ञकर्म से शरीर तपता है, तो उससे रस निकलता है। इस रसधारा में व्यक्ति करुणा और प्रेम को खोजता है, जिसमें मूल आत्मस्वरूप प्रकट होता है।

मान्यता है कि महिषासुर नाम के राक्षस के सर्वनाश के लिए महालया के दिन मां दुर्गा का आहवान होता है। अमावस्या की सुबह पितरों को विदाई और माता को आमंत्रण दिया जाता है। इसके बाद वह धरती पर आती है और नौ दिनों तक अपनी कृपा बरसाती हैं। महालया के दिन मूर्तिकार मां दुर्गा की आंखों को तैयार करते हैं। यह प्रतीक बताता है कि अब अंतर्यात्रा का समय है। शरीर और मन को अंतर्मुखी कर तप की साधना से शक्ति को प्राप्त करना है। तपस्या का पहला काम है अपनी मन के बंधन को खोलना और आत्मा की ओर आरोहन कराना। संसार को एक व्यक्ति के रूप में देखने के बदले समाज के एक अंग के रूप में देखना और सोचना होता है। शक्ति की यात्रा का पहला पड़ाव तप है। सहन करने की शक्ति को तितिक्षा कहा गया है। यह तितिक्षा भी तप का ही एक रूप है। धैर्यपूर्वक सबकुछ बर्दाश्त करने की क्षमता ही तप है। हरेक व्यक्ति के अंदर के केंद्र पर भगवती की शक्ति है। वह शक्ति निरंतर तपस्या रत है। उसी तपस्य के बल पर यह शरीर क्रियाशील और गतिमान रहता है। जब भी व्यक्ति अपने दुख के क्षण में, पतन की पराकाष्ठा को पहुंचता है, तो वह शक्ति ही धारण करती है। उस देवत्व के देह से जुड़ने के कारण ही जीवन आगे बढ़ पाता है।

यह तप ही व्यक्ति का बल है। यह नैतिकता पर अडिग रहने का धैर्य देता है। सबकुछ बर्दाश्त कर लेता है, लेकिन शील के पथ को नहीं छोड़ता है। जब व्यक्ति तपता है, तो वह राम बनता है। तपस्या की अग्नि से भगवती सीता निकलती है। इस तप के बाहरी आवरण में आग है, लेकिन भीतर एक माधुर्य है। यह जीवन को अस्तित्व से जोड़ता है। और मानवीय स्तर पर एक करुणा की धारा को समाज के साथ। क्वांर के दूसरे पक्ष में तप साधना से चित का विस्तार होता है। भौतिक रात की प्राणशक्ति पर चित्त का केंद्रित होना एक शुभ संकेत है। आध्यात्मिक जीवन में आरोहण के अभिलाषी अपनी संवेदना को विस्तार कर, चित्त को चिन्मय की भूमि से जोड़ देते हैं। महालया से विजयदशमी की तक जो हम अंतर्यात्रा करते हैं, उसमें देह प्राण से लेकर आत्मा तक के हरेक अणु और जीवन का रचनात्मक संतुलन स्थापित होता है।

महालया से शरद का संक्रमण काल शुरू होता है, जब सूर्य की किरणों से धरती खूब तपती है। लेकिन रात्रि मधुर होती है। तप में तेज का वास है। तप की साधना से हमारे अंदर का तेज ही मधु बनती है। मास के शुक्ल पक्ष में प्रतिदिन प्रतिपदा से पूर्णिमा तक बाहरी शक्ति और ऊर्जा में ब़ढ़ोŸारी होती है। लेकिन ठीक इसके उल्टे कृष्णपक्ष में प्रतिपदा से अमावस्या तक बाहरी शक्ति और ओज में क्षय होता है, लेकिन आंतरिक ऊर्जा असीमित रूप से बढ़ती जाती है। पूर्णिमा को ऊर्जा का रूप श्री या मधु का होता है। अमावस्या की रात्रि को वही ऊर्जा रुद्राणी हो जाती है। अमावस्या को सोम की षोडषी कला के साथ शक्ति जागृत हो जाती है। महालया एक यज्ञ की अहोरात्रि है। अमावस्या की महारात्रि, महारात्रि में महामाया के तत्व की स्थापना जीवन और जगत में माता भगवती की स्थापना है। नारी से ऊपर देवत्व तत्व से अपने मन-तन को जोडने में महालया एक माध्यम बनती है। यह भौतिक दिन-रात नहीं है। यह महारात है, कालरात है। यह मोहरात के ऊपर परमशक्ति की क्रियाशीलता के आनंद की बात है। अस्तित्व की शक्ति का प्राणधर्म जब जीवन में उतरता है, तो वह आनंद की एक धारा प्रवाहित करती है। जीवन और जगत में इस धारा को होना ही जीवन की खोज है।


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